पेपर लीक कानून और सख्त: लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) संशोधन अधिनियम, 2026
मुख्य लेखप्रारंभिक और मुख्यJuly 2026
चर्चा में क्यों
2026 की चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में अनियमितताओं पर विरोध के बाद संसद ने एक संशोधन पारित किया जो पेपर लीक की सज़ा बढ़ाता है और जाँच तथा विचारण की समय सीमाएँ तय करता है। लोक सभा ने इसे 29 जुलाई को और राज्य सभा ने 30 जुलाई 2026 को पारित किया, और अब यह एक अधिनियम है।
पृष्ठभूमि
- लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम, 2024 भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में नकल के विरुद्ध पहला केंद्रीय कानून था।
- यह संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्डों, बैंकिंग कार्मिक संस्थान और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं पर लागू होता है।
- इसके अपराध संज्ञेय, अजमानतीय और अशमनीय हैं।
- 2026 के विवाद से पता चला कि सज़ा के आकार ने नहीं, धीमी जाँच ने कानून को कुंद किया था: एक पुराने मामले में एक अभियुक्त को डिफ़ॉल्ट ज़मानत मिल गई क्योंकि आरोप पत्र समय पर दाखिल नहीं हुआ।
संशोधन क्या बदलता है
- व्यक्ति: कारावास बढ़कर पाँच से दस वर्ष।
- संगठित लीक: सात से दस वर्ष, और कम से कम ₹10 करोड़ का जुर्माना।
- सेवा प्रदाता, यानी केंद्र और सॉफ़्टवेयर चलाने वाली फ़र्में: अधिक जुर्माना और आठ वर्ष का प्रतिबंध।
- गति: जाँच दो महीने में; हर राज्य और संघ राज्य क्षेत्र को एक सत्र न्यायालय को विशेष त्वरित न्यायालय नामित करना होगा, जिसे आरोप पत्र के तीन महीने के भीतर विचारण पूरा करना होगा।
विश्लेषण
- निवारण: लीक गिरोह एक पेपर से भारी रकम कमाता है, इसलिए सज़ा लाभ से अधिक होनी चाहिए।
- शृंखला के नीचे तक जवाबदेही: परीक्षाएँ बाहरी एजेंसियों को सौंपी जाती हैं, और कानून अब ठेकेदार तक पहुँचता है।
- अधिकार के रूप में गति: शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 का अंग है, और यह अभ्यर्थी और अभियुक्त दोनों के हित में है।
- संघीय समस्या: पुलिस और निचली अदालतें राज्य चलाते हैं, इसलिए विशेष न्यायालयों की माँग करने वाला केंद्रीय कानून तभी काम करता है जब राज्य उनमें कर्मचारी रखें।
- सज़ा नुकसान के बाद आती है: लीक हर वर्ष लाखों अभ्यर्थियों को पहले ही नुकसान पहुँचा चुका होता है।
उद्धृत करने योग्य मामले
- Hussainara Khatoon v. State of Bihar (1979): शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण के अधिकार का अंग है।
- Vanshika Yadav v. Union of India (2024): व्यवस्थागत उल्लंघन के प्रमाण के बिना न्यायालय ने चिकित्सा प्रवेश परीक्षा रद्द करने से इनकार किया, और परीक्षण एजेंसी में सुधार को कहा।
आगे की राह
- राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी को एक सांविधिक निकाय बनाया जाए, जो संसद के प्रति उत्तरदायी हो; आज यह एक पंजीकृत सोसाइटी है।
- परीक्षाओं की रूपरेखा लीक रोधी हो: सुरक्षित डिजिटल वितरण और पेपर तक कम हाथों की पहुँच।
- विशेष न्यायालयों को न्यायाधीश और अभियोजक दिए जाएँ, वरना तीन महीने की समय सीमा पूरी नहीं होगी।
- एक ही परीक्षा पर टिके दाँव को कम किया जाए, जो लीक को इतना लाभदायक बनाता है।
प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य
- मूल कानून 2024 का है; संशोधन 2026 का है।
- अपराध संज्ञेय, अजमानतीय और अशमनीय हैं।
- जाँच दो महीने में; आरोप पत्र से तीन महीने में विचारण।
- संगठित लीक: कम से कम ₹10 करोड़ का जुर्माना।
स्रोत: The Hindu, 30 Jul 2026: Parliament Monsoon Session Day 9 highlights: Rajya Sabha passes anti-paper leak law (opens in a new tab) · PRS Legislative Research, 30 Jul 2026: The Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026: Bill text (opens in a new tab) · PRS Legislative Research, 30 Jul 2026: The Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026: Bill summary (opens in a new tab) · PRS Legislative Research, 31 Jul 2026: Monthly Policy Review, July 2026 (opens in a new tab)
पहले की कवरेज: लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम, 2024 · मासिक पत्रिका, July 2026
यह पृष्ठ अंग्रेज़ी पृष्ठ का मशीनी अनुवाद है। संदेह होने पर अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक है। अनुवाद की त्रुटि बताएँ
