सिंधु जल संधि
प्रारंभिक और मुख्यइस पर समसामयिकी: नदियाँ: बँटवारा, जोड़ और विवाद
1960 की सिंधु जल संधि, जो विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई और कराची में नेहरू तथा अयूब खान ने हस्ताक्षरित की, सिंधु तंत्र की छह नदियों को भारत और पाकिस्तान के बीच बाँटती है। तीन पूर्वी नदियाँ, रावी, ब्यास और सतलुज, भारत के लिए हैं और वह उन्हें बिना किसी प्रतिबंध के काम में ला सकता है। तीन पश्चिमी नदियाँ, सिंधु, झेलम और चिनाब, पाकिस्तान को आवंटित हैं, पर भारत उनका उपयोग घरेलू ज़रूरतों, सीमित सिंचाई और ऐसी जलविद्युत के लिए कर सकता है जो पानी संचित न करे, यानी run of the river परियोजनाओं के लिए, और यह संधि के अनुबंधों में लिखे डिज़ाइन नियमों के अधीन है। एक स्थायी सिंधु आयोग, जिसमें दोनों पक्षों से एक एक आयुक्त होता है, वर्ष में कम से कम एक बार मिलता है और आँकड़ों का आदान प्रदान करता है। विवाद एक सीढ़ी चढ़ते हैं: आयोग, तकनीकी प्रश्नों पर तटस्थ विशेषज्ञ, और कानूनी प्रश्नों पर मध्यस्थता न्यायालय। संधि तीन युद्धों से बची रही; उस पर दबाव पश्चिमी नदियों पर भारतीय परियोजनाओं से आता है और, अप्रैल 2025 से, भारत द्वारा उसे स्थगित रखने से।
छह नदियाँ, दो पक्ष
| पूर्वी नदियाँ | पश्चिमी नदियाँ | |
|---|---|---|
| Rivers | Ravi, Beas, Sutlej | Indus, Jhelum, Chenab |
| Allotted to | India | Pakistan |
| India may | use fully; store and divert | use for domestic needs, limited irrigation and run of river hydropower, storage capped |
| Share of system flow | about a fifth | about four fifths |
| Indian projects | Bhakra, Pong, Ranjit Sagar, Shahpurkandi | Salal, Baglihar, Kishenganga, Ratle, Pakal Dul |
| Disputes | none | Baglihar 2007, Kishenganga 2013, Ratle pending |
- बँटवारा नदी से है, मात्रा से नहीं: पाकिस्तान की तीन नदियाँ तंत्र के प्रवाह का लगभग 80 प्रतिशत ले जाती हैं, यही कारण है कि पाकिस्तान संधि को भारत के प्रति उदार कहता है और भारत उसे पाकिस्तान के प्रति उदार कहता है।
- पश्चिमी नदियों पर भारत के अनुमत उपयोग: सीमित पोंडेज के साथ run of the river जलविद्युत, नियत रकबे पर कृषि उपयोग, और 3.6 मिलियन एकड़ फुट तक सीमित भंडारण; जो परियोजनाएँ विवाद में हैं, बगलिहार, किशनगंगा, रतले, वे सब स्पिलवे गेट और पोंडेज जैसे डिज़ाइन के ब्योरों को लेकर हैं।
- विवाद की सीढ़ी परखी जा चुकी है: एक तटस्थ विशेषज्ञ ने 2007 में बगलिहार पर बड़े पैमाने पर भारत के पक्ष में निर्णय दिया; एक मध्यस्थता न्यायालय ने 2013 में किशनगंगा पर निर्णय देते हुए न्यूनतम प्रवाह के साथ परियोजना की अनुमति दी; 2022 से पाकिस्तान किशनगंगा और रतले पर दोनों रास्ते एक साथ चला रहा है, जिस पर भारत की आपत्ति है कि यह संधि के बाहर है।
- भारत ने जनवरी 2023 में संधि में संशोधन के लिए नोटिस दिया, यह कहते हुए कि पाकिस्तान बातचीत से इनकार करता है, और अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद घोषणा की कि वह संधि को स्थगित रखेगा, जिससे आँकड़ों का साझा होना और आयोग की बैठकें रुक गईं; संधि में न निकलने का कोई उपबंध है और न स्थगन का।
- पूर्वी नदियों का पूरा उपयोग भाखड़ा, पोंग और रणजीत सागर बाँधों तथा इंदिरा गांधी नहर के माध्यम से होता है; रावी से पाकिस्तान को जाने वाला अप्रयुक्त हिस्सा वही पानी है जिसे शाहपुरकंडी परियोजना रोकने के लिए है।
मुख्य परीक्षा: संधि की कमज़ोरी ही उसके टिकने का कारण है: वह नदियों को इतनी पूरी तरह अलग कर देती है कि दोनों देशों को कभी सहयोग करना ही नहीं पड़ा, और जिस संधि को भरोसे की ज़रूरत नहीं, वह भरोसा टूटने पर कोई साधन भी नहीं देती।
यह भी देखें: सोन समझौता · नदी जोड़ो · ब्रह्मपुत्र और चीन · Farakka and the 1996 Ganges Water Treaty
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