अरावली: उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक परिभाषा
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चर्चा में क्यों
25 मई 2026 के एक आदेश से उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2025 में स्वीकार की गई अरावली पहाड़ियों की परिभाषा की समीक्षा के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की, और प्रबंधन योजना तैयार होने तक नए खनन पट्टों पर रोक लगा दी।
पृष्ठभूमि
- अरावली विश्व के सबसे पुराने वलित पर्वतों में से हैं। ये गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में लगभग 700 किमी तक फैली हैं।
- ये थार मरुस्थल और उत्तरी मैदानों के बीच खड़ी हैं, और रेत के पूर्व की ओर फैलाव को धीमा करती हैं।
- इनकी दरारयुक्त चट्टानें वर्षा जल को भीतर रिसने देती हैं, इसलिए ये दिल्ली के आसपास के क्षेत्र के लिए भूजल का पुनर्भरण करती हैं।
- इनमें भवन निर्माण के पत्थर और खनिज हैं, इसी कारण दशकों से खनन इन्हें खोखला करता रहा है।
परिभाषा और उसका महत्व
- कानून किसकी रक्षा करता है, यह इस पर निर्भर है कि अरावली किसे माना जाए।
- नवंबर 2025 में न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय की परिभाषा स्वीकार की: पहाड़ी वह है जो 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची हो, और श्रेणी 500 मीटर के भीतर ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ है।
- भारतीय वन सर्वेक्षण व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है: अरावली क्षेत्र में अपने आसपास से ऊँची कोई भी भूमि, क्योंकि निचली पहाड़ियाँ भी रेत को रोकती हैं।
- ऊँचाई की कसौटी निचली पहाड़ियों और उनके बीच के अंतरालों को खनन के लिए खुला छोड़ देती है।
न्यायालय ने अब क्या आदेश दिया है
- भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के महानिदेशक की अध्यक्षता में एक समिति परिभाषा की समीक्षा करेगी।
- ICFRE सारंडा वन की योजना के मॉडल पर सतत खनन के लिए एक प्रबंधन योजना तैयार करेगी।
- तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जा सकता।
- योजना सभी राज्यों में फैली पूरी श्रेणी को समेटेगी।
- सतत खनन योजना
- एक योजना जो तय करती है कि कोई भूदृश्य बिना स्थायी क्षति के कहाँ और कितना खनन सह सकता है।
बड़ा तर्क
- अभियानकर्ताओं का कहना है कि परिभाषा संरक्षण की पूर्व शर्त नहीं है: पश्चिमी घाट को पहले किसी पहाड़ी को परिभाषित किए बिना प्रशासनिक इकाइयों के आधार पर संरक्षित किया गया।
- वे माँग करते हैं कि पूरी श्रेणी को Critical Ecological Zone माना जाए, और प्रदूषक भुगतान करे (polluter pays) सिद्धांत के अंतर्गत खनन करने वालों को उत्तरदायी ठहराया जाए।
- राज्य खनन से मिलने वाली आजीविका और राजस्व की ओर संकेत करते हैं।
- प्रदूषक भुगतान करे सिद्धांत
- जो पर्यावरणीय क्षति पहुँचाता है, उसे ही उसकी मरम्मत का खर्च उठाना चाहिए।
आगे की राह
- अरावली को केवल ऊँचाई से नहीं, पारिस्थितिक कार्य से परिभाषित किया जाए।
- उन निचली पहाड़ियों और अंतरालों का मानचित्रण और संरक्षण किया जाए, जो रेत को रोकने का काम करते हैं।
- खनन से क्षतिग्रस्त भूमि का पुनरुद्धार किया जाए, जैसा अरावली ग्रीन वॉल पहल का लक्ष्य है।
प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य
- अरावली गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से होकर गुज़रती है।
- स्वीकृत परिभाषा 100 मीटर की ऊँचाई का उपयोग करती है।
- समीक्षा समिति की अध्यक्षता ICFRE के महानिदेशक करते हैं।
- खनन योजना का मॉडल, सारंडा वन, झारखंड में है।
स्रोत: Frontline, 27 Jun 2026: The Aravallis bleed while committees argue over definitions (opens in a new tab) · PIB, 17 Jun 2026: HMEFCC Shri Bhupender Yadav Presides over Event to Mark World Day to Combat Desertification and Drought in New Delhi (opens in a new tab)
पहले की कवरेज: अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति · मासिक पत्रिका, June 2026
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