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भारत का कार्बन बाज़ार: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना

प्रारंभिक और मुख्यइस पर समसामयिकी: जलवायु वित्त, कार्बन बाज़ार और कार्बन मूल्य निर्धारण

कार्बन बाज़ार कार्बन डाइऑक्साइड के एक टन को खरीदी और बेची जा सकने वाली वस्तु बनाकर उसकी कीमत तय करता है। भारत का बाज़ार ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 पर टिका है, जिसने केंद्र को जून 2023 में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (Carbon Credit Trading Scheme) अधिसूचित करने दिया। योजना के दो भाग हैं। अनुपालन तंत्र ऊर्जा गहन उद्योगों की बाध्यताधारी इकाइयों को उत्सर्जन तीव्रता, यानी प्रति इकाई उत्पादन पर उत्सर्जन, का लक्ष्य देता है; जो इकाई अपने लक्ष्य से बेहतर करती है उसे कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र मिलते हैं, और जो चूकती है उसे वे खरीदने पड़ते हैं। ऑफसेट तंत्र बाकी किसी को भी ऐसी परियोजना पंजीकृत करने देता है जो उत्सर्जन हटाती या टालती है, और उसके क्रेडिट बेचने देता है। योजना का संचालन ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) करता है, रजिस्ट्री ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया रखता है, और व्यापार का विनियमन केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग करता है। यह ऊर्जा दक्षता की निष्पादन, उपलब्धि एवं व्यापार (PAT) योजना से निकली है, जिसके प्रमाणपत्रों की जगह यह लेती है।

भारत के कार्बन बाज़ार के दो हिस्से

अनुपालन तंत्रऑफसेट तंत्र
Who takes partobligated units in notified energy intensive sectorsany registered project, voluntary
What is measuredemissions intensity against a targetemissions removed or avoided by a project
What is earnedcarbon credit certificates for beating the target; shortfall must be boughtcertificates for verified reductions
Who buysunits that missed their targetIndian and, under Article 6, foreign buyers
Grows out ofPAT energy saving certificatesClean Development Mechanism style project credits
एक बाज़ार, दो दरवाज़े: उद्योग बाध्य है, बाकी सब आमंत्रित हैं।Source: Carbon Credit Trading Scheme, 2023; Energy Conservation (Amendment) Act, 2022
  • तीव्रता, सीमा नहीं: भारत के लक्ष्य प्रति टन उत्पाद उत्सर्जन के हैं, इसलिए उत्पादन बढ़ सकता है और तीव्रता घट सकती है, जो इसके राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्य का ही तर्क है।
  • अनुपालन पक्ष के लिए नामित क्षेत्रों में लोहा और इस्पात, सीमेंट, एल्युमीनियम, क्लोर अल्कली, उर्वरक, लुगदी और कागज़, पेट्रोरसायन, रिफाइनरियाँ और वस्त्र शामिल हैं, यानी वही क्षेत्र जो PAT पहले से कवर करती थी।
  • ऑफसेट पक्ष ही वह रास्ता है जिससे भारत का अनुच्छेद 6 व्यापार चलेगा: अनुच्छेद 6.2 के तहत विदेश में बेचे गए क्रेडिट के लिए तदनुरूपी समायोजन चाहिए ताकि उसे भारत के NDC में भी न गिना जाए, और केवल पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की 2023 की सकारात्मक सूची की गतिविधियाँ ही बेची जा सकती हैं।
  • एक प्रमाणपत्र एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य है; व्यापार विद्युत एक्सचेंजों पर होता है; प्रमाणपत्र हमेशा के लिए जमा नहीं रखे जा सकते, इसलिए कीमत इस पर निर्भर करती है कि लक्ष्य कितने कसे हुए रखे जाते हैं।
  • विदेश में यह क्यों मायने रखता है: यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (Carbon Border Adjustment Mechanism) आयात पर उस कार्बन के लिए शुल्क लगाता है जिसकी कीमत घर पर नहीं चुकाई गई, इसलिए एक विश्वसनीय भारतीय कार्बन कीमत इस्पात और एल्युमीनियम के निर्यात के लिए बचाव है।

मुख्य परीक्षा: कार्बन बाज़ार तभी काम करता है जब लक्ष्य चुभे; भारत के तीव्रता लक्ष्य पूरे हो जाने लायक रखे गए हैं, इसलिए उसका बाज़ार एक लेखा प्रणाली के रूप में शुरू होगा और कीमत का संकेत तभी बनेगा जब लक्ष्य कसे जाएँगे।

UPSC पूछ चुका है

  • Prelims 2025: पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6 और कार्बन बाज़ार

यह भी देखें: कार्बन सीमा समायोजन तंत्र · संप्रभु हरित बॉन्ड · परमाणु ऊर्जा के लिए हरित दर्जा · The Paris Agreement: how it works

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