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राष्ट्रीय हरित अधिकरण और प्रदूषण बोर्ड

प्रारंभिक और मुख्यइस पर समसामयिकी: न्यायालय, अधिकरण और पर्यावरण विधिशास्त्र

भारत में पर्यावरण से जुड़े मामले दो तरह के निकायों तक पहुँचते हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रवर्तन करते हैं: जल अधिनियम 1974 से बना केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) मानक तय करता है और समन्वय करता है; राज्य बोर्ड वे सम्मतियाँ जारी करते हैं जिनकी हर प्रदूषणकारी इकाई को ज़रूरत होती है, निगरानी करते हैं, और किसी इकाई को बंद करा सकते हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) न्यायनिर्णयन करता है: NGT अधिनियम, 2010 से न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्यों वाले विशिष्ट न्यायालय के रूप में गठित, यह सात पर्यावरण कानूनों के तहत विवाद सुनता है, क्षतिपूर्ति और पुनर्स्थापन का आदेश दे सकता है, और इसे सतत विकास, एहतियाती सिद्धांत तथा प्रदूषक भुगतान करे को लागू करना होता है। यह दिल्ली में बैठता है और भोपाल, पुणे, कोलकाता तथा चेन्नई में इसकी क्षेत्रीय पीठें हैं; अपील सीधे उच्चतम न्यायालय जाती है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम इसकी सूची से बाहर हैं, इसलिए वन्यजीव विवाद उच्च न्यायालयों में जाता है।

पर्यावरण कानून में कौन क्या करता है

BodyCreated byDoesDoes not
Central Pollution Control BoardWater Act, 1974sets standards, coordinates States, runs monitoring networksdoes not license units (the State boards do)
State Pollution Control BoardsWater Act, 1974consent to establish and operate, inspection, closure orders, public hearings under the EIA Notificationcannot award compensation
National Green TribunalNGT Act, 2010adjudicates under seven laws, compensation and restoration, six month target, suo motuno jurisdiction over the Wildlife Act or the Forest Rights Act; appeal only to the Supreme Court
Supreme CourtConstitution, Article 32the doctrines: absolute liability, polluter pays, precaution, public trust; continuing mandamus in Godavarmannot a first instance forum for ordinary pollution cases
बोर्ड प्रवर्तन करते हैं, अधिकरण न्यायनिर्णयन करता है, उच्चतम न्यायालय सिद्धांत तय करता है; वन्यजीव और वन अधिकार अधिकरण से बाहर रहते हैं।Source: Water Act, 1974; NGT Act, 2010, Schedule I
  • NGT की अनुसूची में सात कानून: जल अधिनियम 1974, जल उपकर अधिनियम 1977, वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, वायु अधिनियम, 1981, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम 1991 और जैविक विविधता अधिनियम, 2002।
  • अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता से बँधा नहीं है और नैसर्गिक न्याय का पालन करता है; उसे मामला छह महीने के भीतर निपटाने का प्रयास करना होता है; वह किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर स्वप्रेरणा से मामला ले सकता है, यह शक्ति उच्चतम न्यायालय ने 2021 में बरकरार रखी।
  • बोर्ड: निर्माण से पहले स्थापना की सम्मति, चलाने से पहले संचालन की सम्मति, दोनों नवीकरणीय; CPCB राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक और बहिःस्राव मानक तय करता है; बोर्डों की कमज़ोरी स्टाफ और राजनीतिक नियंत्रण है, जिसे 1984 से हर समिति ने दर्ज किया है।
  • अधिकरण जिन सिद्धांतों को लागू करता है उनका स्रोत उच्चतम न्यायालय ही रहा है: पूर्ण दायित्व (ओलियम गैस रिसाव, 1987), प्रदूषक भुगतान करे और एहतियाती सिद्धांत (वेल्लोर, 1996), लोक न्यास सिद्धांत (स्पैन मोटल्स, 1997), जो कमल नाथ मामले में अंतरपीढ़ीगत समता के साथ आया, और 1996 से गोदावर्मन वन आदेश। इनमें से कोई भी संसद से नहीं आया: न्यायालय ने इन्हें मामला दर मामला गढ़ा।
  • हाल का टकराव: राज्यों और शहरों पर अधिकरण के पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति आदेश, उसकी स्वप्रेरणा वाली पद्धति, और उच्चतम न्यायालय की 2024 की टिप्पणियाँ कि अधिकरण को दंड देने से पहले कारण देने होंगे और पक्षों को सुनना होगा।

मुख्य परीक्षा: NGT ने भारत को तेज़ मंच दिया, तेज़ प्रवर्तन नहीं: उसके आदेश उन्हीं कम स्टाफ वाले राज्य बोर्डों पर आकर गिरते हैं जिनकी विफलताएँ मामला लेकर आई थीं, इसलिए अधिकरण की पहुँच वहीं खत्म हो जाती है जहाँ बोर्डों की क्षमता।

UPSC पूछ चुका है

  • Prelims 2018: राष्ट्रीय हरित अधिकरण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कैसे अलग है

अतिरिक्त पठन: The National Green Tribunal Bill, 2009 (PRS India)

यह भी देखें: अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति · कार्योत्तर पर्यावरणीय स्वीकृति · Environmental clearance: the EIA Notification, 2006

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