VidBodh AcademyThe art and science of civil services preparation

4 सितंबर 2026GS2विषय

राजव्यवस्था: संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका और विवाद निवारण

मौलिक प्रश्न

आज के 5
  1. 1 · VidBodh original10 अंक150 शब्द

    अनुच्छेद 143 के अंतर्गत दी गई परामर्शी राय की प्रकृति की चर्चा कीजिए। इसका बाध्यकारी बल अनुच्छेद 141 के अंतर्गत विधि की घोषणा से किस प्रकार भिन्न है?

    मॉडल उत्तर देखें

    अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को विधि का कोई प्रश्न उच्चतम न्यायालय को निर्दिष्ट करने देता है। न्यायालय निर्णय नहीं, राय देता है।

    शक्ति की प्रकृति

    एक संदर्भ, कोई मुकदमा नहीं: इसमें न कोई निजी मुकदमेबाज़ी होती है, न विरोधी पक्ष।

    न्यायालय मना कर सकता है: अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत यह कारण बताते हुए उत्तर देने से इनकार कर सकता है।

    एक खंड भिन्न है: पुरानी संधियों से संबंधित अनुच्छेद 143(2) के अंतर्गत न्यायालय को प्रतिवेदन देना ही होगा।

    यह अनुच्छेद 141 से कैसे भिन्न है

    अनुच्छेद 141 बाध्यकारी है: न्यायालय द्वारा घोषित विधि उसके अधीन सभी न्यायालयों को बाँधती है।

    अनुच्छेद 141 के संदर्भ में परामर्शी राय: यह परामर्शी है, और राष्ट्रपति इस पर कार्य न करने के लिए स्वतंत्र हैं।

    यह किसी निर्णय को फिर नहीं खोल सकती: कावेरी संदर्भ, 1993 ने माना कि किसी तय निर्णय पर इस मार्ग से पुनर्विचार नहीं हो सकता।

    हाल का उदाहरण: 2025 में न्यायालय ने परामर्श दिया कि राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती।

    परामर्शी राय में न्यायालय का प्राधिकार होता है, पर निर्णय का बल नहीं। जहाँ निर्णय आदेश देता, वहाँ यह राज़ी करती है।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    दो माँगें। शक्ति की प्रकृति, और अनुच्छेद 141 से अंतर।

    निहित माँग

    अंतर ही इसका केंद्र है। एक परामर्श है, दूसरी बाध्यकारी विधि।

    उत्तर की संरचना

    अनुच्छेद 143 क्या है → शक्ति की प्रकृति → अंतर → हाल का उदाहरण → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 143(1) और (2), अनुच्छेद 141, अयोध्या और कावेरी संदर्भ। सार वाक्य: जहाँ निर्णय आदेश देता, वहाँ यह राज़ी करती है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    शक्ति की प्रकृति

    न्यायालय परामर्शी क्षेत्राधिकार में बैठता है। यह कठोर अर्थ में न्यायिक शक्ति का प्रयोग नहीं कर रहा होता।

    अनुच्छेद 145(3) के अंतर्गत संदर्भ की सुनवाई पाँच न्यायाधीशों की पीठ करती है।

    विशेष संदर्भ संख्या 1, 1993 में अयोध्या प्रश्न को अनावश्यक और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध बताते हुए लौटा दिया गया।

    विशेष संदर्भ संख्या 1, 1998, अर्थात तृतीय न्यायाधीश मामला, एक परामर्शी राय है जिसने कॉलेजियम को आकार दिया।

    अनुच्छेद 143(2) संविधान लागू होने से पहले किए गए करारों से जुड़े विवादों को समाहित करता है।

    यह अनुच्छेद 141 से कैसे भिन्न है

    अनुच्छेद 141 उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि की बात करता है। यह नीचे के सभी न्यायालयों को बाँधती है।

    बाद के किसी मामले में न्यायालय अपनी ही परामर्शी राय से बँधा नहीं होता।

    कावेरी जल विवाद अधिकरण मामला, 1993: अनुच्छेद 143 किसी बाध्यकारी निर्णय का पुनर्विलोकन नहीं कर सकता।

    फिर भी परामर्शी रायों ने बड़े प्रश्न सुलझाए हैं, जैसे तृतीय न्यायाधीश मामला।

    उच्च न्यायालय के पास कोई परामर्शी क्षेत्राधिकार नहीं है। यह शक्ति केवल उच्चतम न्यायालय के पास है।

    याद रखने योग्य संदर्भ

    Delhi Laws Act, 1951, इस पर कि विधायी शक्ति का प्रत्यायोजन किस सीमा तक हो सकता है।

    Kerala Education Bill, 1958, शिक्षा में अल्पसंख्यक अधिकारों पर।

    बेरुबारी यूनियन, 1960 ने माना कि क्षेत्र के अध्यर्पण के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है।

    Special Courts Bill, 1978, एक प्रस्तावित विशेष न्यायालय की वैधता पर।

    2G राष्ट्रपति का संदर्भ, 2012: संसाधनों के आवंटन की एकमात्र विधि नीलामी नहीं है।

    Polity

  2. 2 · VidBodh original15 अंक250 शब्द

    दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निरर्हता (disqualification) के आधारों की व्याख्या कीजिए। परीक्षण कीजिए कि क्या अध्यक्ष (Speaker) में न्यायनिर्णयन शक्ति निहित करना निष्पक्ष अधिकरण की अपेक्षा के अनुरूप है, और विकल्पों का सुझाव दीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    दसवीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन, 1985 से आई। यह दलबदल के लिए सदस्य को निरर्हित करती है।

    आधार

    सदस्यता छोड़ना: जो सदस्य स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ देता है, वह निरर्हित हो जाता है।

    व्हिप की अवहेलना: दल के निर्देश के विरुद्ध मत देना या मतदान से विरत रहना निरर्हता को आकर्षित करता है।

    एक अवसर के साथ: दल पंद्रह दिनों के भीतर उस कृत्य को माफ़ कर सकता है।

    निर्दलीय और मनोनीत सदस्य: किसी दल में शामिल होने वाला निर्दलीय सदस्य बाहर हो जाता है। मनोनीत सदस्य को छह महीने मिलते हैं।

    एकमात्र छूट: विलय, जहाँ विधायक दल के दो तिहाई सदस्य सहमत हों।

    विभाजन का बचाव समाप्त: 91वें संविधान संशोधन, 2003 ने एक तिहाई विभाजन वाला अपवाद हटा दिया।

    अध्यक्ष से जुड़ी समस्या

    दल का व्यक्ति निर्णय करता है: अध्यक्ष दलीय बहुमत के बल पर पद धारण करते हैं।

    न्यायालय ने जोखिम देखा: किहोतो होलोहन, 1992 ने योजना को बरकरार रखा, पर अल्पमत ने अध्यक्ष पर संदेह व्यक्त किया।

    पुनर्विलोकन बना रहता है: उसी मामले ने न्यायालयों को वर्जित करने वाले खंड को निरस्त किया।

    विलंब ही वास्तविक हथियार है: निर्णय न करने वाले अध्यक्ष के कारण दलबदलू पूरा कार्यकाल पूरा कर लेता है।

    न्यायालय ने यह कहा है: कैशाम मेघचंद्र, 2020 ने अध्यक्षों से तीन महीने के भीतर निर्णय करने को कहा।

    विकल्प

    स्वतंत्र अधिकरण: याचिकाओं पर निर्णय करने वाले सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जैसा न्यायालय ने स्वयं सुझाया।

    निर्वाचन आयोग का मार्ग: अनुच्छेद 103 और 192 का अनुसरण, जहाँ राष्ट्रपति या राज्यपाल इसकी राय पर कार्य करते हैं।

    व्हिप को सीमित करें: जैसा Law Commission ने प्रस्तावित किया, इसे केवल धन विधेयकों और विश्वास प्रस्तावों पर लागू करें।

    आधार पर्याप्त स्पष्ट हैं। मंच स्पष्ट नहीं है। एक निष्पक्ष प्रश्न का निर्णय एक हितबद्ध पद करता है, और सुधार वहीं से आरंभ होना चाहिए।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    तीन माँगें। आधारों की व्याख्या करें, मंच को परखें, फिर विकल्प सुझाएँ।

    निहित माँग

    शिकायत आधारों को लेकर नहीं है। यह इस बारे में है कि निर्णय कौन करता है, और कब।

    उत्तर की संरचना

    आधार → अध्यक्ष से जुड़ी समस्या → विकल्प → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: 52वाँ और 91वाँ संविधान संशोधन, किहोतो होलोहन, कैशाम मेघचंद्र, अनुच्छेद 103 और 192। सार वाक्य: एक निष्पक्ष प्रश्न का निर्णय एक हितबद्ध पद कर रहा है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    आधार

    दलबदल पर 1967 से बहस चल रही थी। दसवीं अनुसूची इसका उत्तर थी।

    रवि नाइक बनाम भारत संघ, 1994 ने माना कि सदस्यता छोड़ना आचरण से अनुमानित किया जा सकता है।

    जी. विश्वनाथन, 1996: दल से निष्कासित सदस्य भी उससे बँधा रहता है।

    91वें संविधान संशोधन के बाद दलबदल के लिए निरर्हित सदस्य पुनः निर्वाचित होने तक मंत्री नहीं बन सकता।

    यदि अध्यक्ष निर्वाचन पर दल की सदस्यता छोड़ देते हैं, तो उन्हें छूट है।

    अध्यक्ष से जुड़ी समस्या

    किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हू, 1992 ने माना कि अध्यक्ष अधिकरण के रूप में कार्य करते हैं, इसलिए पुनर्विलोकन संभव है।

    पुनर्विलोकन असद्भाव (mala fides), विकृति और नैसर्गिक न्याय के उल्लंघन तक सीमित है।

    श्रीमंत बालासाहेब पाटिल, 2019 ने सदस्यों को पूरे कार्यकाल के लिए वर्जित करने वाले अध्यक्ष के आदेश को निरस्त किया।

    महाराष्ट्र पर सुभाष देसाई, 2023 ने विलंब और प्रतिद्वंद्वी व्हिप की मान्यता की आलोचना की।

    पुनः निर्वाचन चाहने वाले अध्यक्ष उसी दल पर निर्भर होते हैं जिसके दलबदलुओं का उन्हें न्याय करना है।

    कई राज्यों में निरर्हता याचिका विधान सभा से भी अधिक समय तक चली।

    विकल्प और रिपोर्टें

    Dinesh Goswami Committee, 1990 ने राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा निर्णय का प्रस्ताव रखा। निर्वाचन आयोग परामर्श देगा।

    Law Commission की 170वीं रिपोर्ट ने व्हिप को विश्वास और धन के विषयों तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा।

    National Commission to Review the Working of the Constitution ने भी ऐसी ही सिफारिश की।

    यूनाइटेड किंगडम में यह परिपाटी है कि अध्यक्ष निर्वाचन पर दल की सदस्यता त्याग देते हैं।

    वैधानिक समय सीमा सबसे सरल समाधान है। चूक होने पर मामला अधिकरण को जाए।

    Polity

  3. 3 · VidBodh original15 अंक250 शब्द

    अनुच्छेद 110 के अंतर्गत धन विधेयक किसे माना जाता है? अध्यक्ष द्वारा त्रुटिपूर्ण प्रमाणन के परिणामों और उपलब्ध न्यायिक पुनर्विलोकन की सीमा का, निर्णीत मामलों के संदर्भ में, परीक्षण कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    अनुच्छेद 110 धन विधेयक को परिभाषित करता है। सूची संपूर्ण है, और विधेयक को केवल उन्हीं विषयों से संबंधित होना चाहिए।

    अनुच्छेद में क्या शामिल है

    कराधान: किसी कर का अधिरोपण, उत्सादन, परिहार या परिवर्तन।

    उधार: सरकार द्वारा धन उधार लेने का विनियमन।

    निधियाँ: संचित निधि और आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा।

    विनियोग: धन की निकासी, और किसी व्यय को निधि पर भारित घोषित करना।

    आनुषंगिक विषय: उपर्युक्त शीर्षों से आनुषंगिक कोई भी विषय, और उससे आगे कुछ नहीं।

    निर्णय कौन करता है: अनुच्छेद 110(3) के अंतर्गत अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है।

    गलत प्रमाणन क्यों मायने रखता है

    राज्य सभा की आवाज़ छिन जाती है: यह केवल चौदह दिनों के भीतर परिवर्तनों की सिफारिश कर सकती है।

    संयुक्त बैठक नहीं: धन विधेयक कभी भी अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक में नहीं जा सकता।

    राष्ट्रपति इसे लौटा नहीं सकते: अनुमति व्यवहारतः एक औपचारिकता है।

    इस प्रकार पूरा सदन दरकिनार हो जाता है: गलत प्रमाणपत्र द्वितीय सदन को विधि निर्माण प्रक्रिया से हटा देता है।

    न्यायालय किस सीमा तक पुनर्विलोकन कर सकते हैं

    प्रारंभिक दृष्टिकोण: मो. सईद सिद्दीकी, 2014 ने अध्यक्ष के निर्णय को पुनर्विलोकन से परे माना।

    मोड़: पुट्टास्वामी, 2018 ने प्रश्न का पुनर्विलोकन किया, यद्यपि बहुमत ने Aadhaar Act को बरकरार रखा।

    असहमति: न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने उस प्रमाणन को संविधान के साथ कपट कहा।

    अब भी अनिर्णीत: रोजर मैथ्यू, 2019 ने बहुमत के मत पर संदेह किया और मुद्दे को बड़ी पीठ को निर्दिष्ट किया।

    प्रवृत्ति: अधिकरणों और अन्य कानूनों में संशोधन वित्त विधेयकों के माध्यम से पारित हुए हैं।

    अंतिमता उन्मुक्ति के समान नहीं है। निर्णय अध्यक्ष करते हैं, पर राज्य सभा को मौन करने वाला प्रमाणपत्र पुनर्विलोकन योग्य रहना चाहिए।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    तीन माँगें। परिभाषा, त्रुटि का परिणाम, और पुनर्विलोकन का दायरा।

    निहित माँग

    प्रश्न वस्तुतः द्विसदनीयता के बारे में है। गलत प्रमाणपत्र एक सदन को मौन कर देता है।

    उत्तर की संरचना

    परिभाषा → गलत प्रमाणन क्यों मायने रखता है → पुनर्विलोकन कहाँ तक जाता है → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 110, अनुच्छेद 108, मो. सईद सिद्दीकी, पुट्टास्वामी, रोजर मैथ्यू, वित्त अधिनियम का मार्ग। सार वाक्य: अंतिमता उन्मुक्ति के समान नहीं है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    अनुच्छेद में क्या शामिल है

    अनुच्छेद 110(1) खंड (a) से खंड (g) तक सात शीर्ष सूचीबद्ध करता है।

    वित्तीय विधेयक अधिक व्यापक है। इसमें धन संबंधी विषयों के साथ अन्य प्रावधान भी होते हैं।

    केवल धन विधेयक पर ही अनुच्छेद 110(4) के अंतर्गत अध्यक्ष का प्रमाणपत्र होता है।

    धन विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर केवल लोक सभा में ही पुरःस्थापित होता है।

    अनुच्छेद 199 राज्यों के लिए यही प्रावधान करता है। विधान सभा के अध्यक्ष निर्णय करते हैं।

    मामले

    मो. सईद सिद्दीकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2014 ने अध्यक्ष के निर्णय को अंतिम और पुनर्विलोकन से परे माना।

    योगेंद्र कुमार जायसवाल, 2016 ने इसी दृष्टिकोण का अनुसरण किया।

    पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ, 2018 ने बहुमत से Aadhaar Act को धन विधेयक के रूप में बरकरार रखा।

    रोजर मैथ्यू बनाम South Indian Bank, 2019 ने उस तर्क पर संदेह किया और इसे सात न्यायाधीशों की पीठ को निर्दिष्ट किया।

    किहोतो होलोहन, 1992 सिद्धांत देता है। अंतिमता खंड न्यायिक पुनर्विलोकन को अपवर्जित नहीं करता।

    उदाहरण और आगे की राह

    अधिकरण सुधार Finance Act, 2017 के माध्यम से किए गए।

    विदेशी अंशदान और धन शोधन कानून में संशोधनों के लिए भी वित्त विधेयकों का उपयोग हुआ है।

    वित्त विधेयक के माध्यम से पिछले कृत्यों के भूतलक्षी विधिमान्यकरण पर न्यायालय में प्रश्न उठाए गए हैं।

    खंड (g) की कठोर व्याख्या इसमें से अधिकांश को रोक देगी। आनुषंगिक का अर्थ आनुषंगिक ही है।

    बड़ी पीठ को भेजा गया संदर्भ अभी निर्णय की प्रतीक्षा में है, इसलिए यह एक जीवंत विषय बना हुआ है।

    Polity

  4. 4 · VidBodh original10 अंक150 शब्द

    विधायी प्रक्रिया में संयुक्त संसदीय समिति के स्थान का परीक्षण कीजिए। क्या लंबे समय तक समिति को सौंपे रखना संवीक्षा को सशक्त करता है या टालने का साधन बनता है?

    मॉडल उत्तर देखें

    संयुक्त संसदीय समिति एक सदन में प्रस्ताव द्वारा गठित होती है। दूसरा सदन इस पर सहमति देता है। यह प्रक्रिया नियमों पर आधारित है।

    प्रक्रिया में इसका स्थान

    दो प्रकार: एक विधेयक की जाँच करती है। दूसरी लोक महत्त्व के किसी विषय की जाँच करती है।

    खंड दर खंड: समिति विधेयक को पंक्ति दर पंक्ति पढ़ती है और संशोधन प्रस्तावित करती है।

    साक्ष्य लिए जाते हैं: मंत्रालय, विशेषज्ञ और प्रभावित समूह इसके समक्ष उपस्थित होते हैं।

    जहाँ यह संवीक्षा को सशक्त करती है

    एक व्यावहारिक उदाहरण: Insolvency and Bankruptcy Code पर समिति ने पारित होने से पहले मसौदे को नया रूप दिया।

    जाँच उजागर कर सकती है: बोफ़ोर्स और 2G पर समितियों ने वे साक्ष्य लिए जो सदन की कोई बैठक नहीं ले सकती थी।

    जहाँ यह टालती है

    विस्तार जुड़ते जाते हैं: डेटा संरक्षण विधेयक पर समिति दो वर्ष से अधिक चली।

    विधेयक बस व्यपगत हो सकता है: भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक बार बार विस्तार के बाद समाप्त हो गया।

    समिति को सौंपना संवीक्षा को सशक्त करता है। लंबे समय तक सौंपे रखना विधेयक को बिना मतदान के दफ़न कर सकता है। उपाय रिपोर्ट के लिए निश्चित समय सीमा है।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    स्थान का परीक्षण करें, फिर 'या तो यह या वह' वाले सीधे प्रश्न का उत्तर दें।

    निहित माँग

    किसी एक पक्ष को न चुनें। समिति को सौंपना और लंबे समय तक सौंपे रखना अलग अलग बातें हैं।

    उत्तर की संरचना

    यह क्या है → इसका स्थान → जहाँ यह सशक्त करती है → जहाँ यह टालती है → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: Insolvency and Bankruptcy Code, बोफ़ोर्स और 2G जाँचें, डेटा संरक्षण विधेयक। सार वाक्य: लंबे समय तक सौंपे रखना विधेयक को बिना मतदान के दफ़न कर सकता है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    प्रक्रिया में इसका स्थान

    सदस्य दोनों सदनों से आते हैं। सामान्य अनुपात लोक सभा से दो और राज्य सभा से एक का है।

    संयुक्त समिति प्रवर समिति से भिन्न है, जो केवल एक सदन की होती है।

    समिति व्यक्तियों और कागज़ात को बुला सकती है, और विभागीय अभिलेख माँग सकती है।

    इसकी रिपोर्ट दोनों सदनों को जाती है। सरकार इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है।

    लोक सभा के विघटन पर समिति के समक्ष लंबित विधेयक व्यपगत हो जाता है।

    जहाँ इसने विधेयक को सशक्त किया

    Insolvency and Bankruptcy Code, 2016: संयुक्त समिति ने पारित होने से पहले मसौदे को नए सिरे से तैयार किया।

    Citizenship Amendment Bill, 2016: संयुक्त समिति ने विभिन्न राज्यों में साक्ष्य लिए।

    बोफ़ोर्स, 1987 और प्रतिभूति घोटाला, 1992 सबसे प्रसिद्ध जाँच समितियाँ हैं।

    2G जाँच, 2011 ने विभाजित रिपोर्ट दी, जो स्वयं एक प्रकार का अभिलेख है।

    शेयर बाज़ार घोटाला जाँच, 2001 से बाज़ार विनियमन में परिवर्तन हुए।

    जहाँ यह विलंब बन गई

    Personal Data Protection Bill, 2019: समिति ने दो वर्ष से अधिक लिए। फिर विधेयक वापस ले लिया गया।

    Land Acquisition Amendment Bill, 2015: बार बार विस्तार हुआ, और यह व्यपगत हो गया।

    विस्तार के लिए केवल एक प्रस्ताव चाहिए, और सदन विरले ही इसे अस्वीकार करता है।

    समिति को सौंपने से इनकार भी किया जा सकता है। 2020 के कृषि कानून किसी समिति को भेजे ही नहीं गए।

    छह महीने की वैधानिक समय सीमा, जिसे एक बार बढ़ाया जा सके, इसमें से अधिकांश को सुलझा देगी।

    Polity

  5. 5 · VidBodh original15 अंक250 शब्द

    न्यायिक जवाबदेही की अवधारणा की चर्चा कीजिए। अनुच्छेद 124 और 217 के अंतर्गत न्यायाधीशों को हटाने के मौजूदा तंत्र की, और उससे पहले की आंतरिक प्रक्रिया की, पर्याप्तता का परीक्षण कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    स्वतंत्रता न्यायाधीश की दबाव से रक्षा करती है। जवाबदेही पूछती है कि न्यायाधीश पर निगरानी कौन रखता है। संविधान इसका केवल एक औपचारिक उत्तर देता है।

    यहाँ जवाबदेही का अर्थ

    विधि के प्रति: निर्णय तर्कसंगत होना चाहिए, और उसके विरुद्ध अपील हो सकती है।

    जनता के प्रति: न्यायालय खुले में बैठते हैं, और उनके आदेश प्रकाशित होते हैं।

    संस्था के प्रति: आचरण Restatement of Values of Judicial Life, 1997 का अनुसरण करता है।

    हटाने का तंत्र

    आधार: अनुच्छेद 124 और 217 केवल सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर हटाने की अनुमति देते हैं।

    प्रक्रिया: लोक सभा के 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव। या राज्य सभा में 50।

    जाँच: Judges (Inquiry) Act, 1968 के अंतर्गत एक समिति आरोप की जाँच करती है।

    मतदान: दोनों सदनों में विशेष बहुमत, उसके बाद राष्ट्रपति को समावेदन।

    यह कभी सफल क्यों नहीं हुआ

    किसी न्यायाधीश को हटाया नहीं गया: न्यायमूर्ति रामास्वामी, 1993 तब बच गए जब एक दल ने सदन में मतदान से परहेज़ किया।

    त्यागपत्र से यह समाप्त हो जाता है: न्यायमूर्ति सौमित्र सेन ने 2011 में राज्य सभा के मतदान के बाद त्यागपत्र दे दिया।

    सीमा बहुत ऊँची है: कदाचार सिद्ध होना चाहिए, और इससे कम कुछ उपलब्ध नहीं है।

    आंतरिक प्रक्रिया

    यह क्या करती है: मुख्य न्यायाधीश उत्तर माँग सकते हैं और न्यायाधीशों की समिति नियुक्त कर सकते हैं।

    यह क्या आदेश दे सकती है: यह त्यागपत्र की सलाह दे सकती है, या हटाने की प्रक्रिया आरंभ करने की सिफारिश कर सकती है।

    हाल में इसका प्रयोग हुआ: 2025 में एक उच्च न्यायालय न्यायाधीश की आंतरिक जाँच से प्रस्ताव आया।

    इसकी कमज़ोरी: इसका कोई वैधानिक आधार नहीं है, और रिपोर्ट हमेशा प्रकाशित नहीं होती।

    संविधान हटाने या कुछ न करने का ही विकल्प देता है। एक क्रमिक वैधानिक तंत्र, जिसमें हटाना सबसे गंभीर मामलों के लिए रखा जाए, स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों की पूर्ति करेगा।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    तीन माँगें। अवधारणा, हटाने का तंत्र, और आंतरिक प्रक्रिया।

    निहित माँग

    कमी यह है कि कुछ न करने और न्यायाधीश को हटाने के बीच कुछ भी नहीं है।

    उत्तर की संरचना

    जवाबदेही का अर्थ → हटाने का तंत्र → यह कभी सफल क्यों नहीं हुआ → आंतरिक प्रक्रिया → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 124 और 217, Judges (Inquiry) Act, रामास्वामी और सौमित्र सेन मामले, 2025 की जाँच। सार वाक्य: संविधान हटाने या कुछ न करने का ही विकल्प देता है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    हटाने का तंत्र

    जाँच समिति में उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश, एक मुख्य न्यायाधीश और एक विधिवेत्ता होते हैं।

    विशेष बहुमत कुल सदस्य संख्या का बहुमत है। साथ ही मत देने वालों में से दो तिहाई की सहमति भी आवश्यक है।

    Sub Committee on Judicial Accountability, 1991: प्रक्रिया आंशिक रूप से न्यायिक है, पूरी तरह राजनीतिक नहीं।

    न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी एकमात्र न्यायाधीश हैं जिनके विरुद्ध जाँच समिति ने कदाचार सिद्ध पाया।

    न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरन ने 2011 में जाँच के दौरान त्यागपत्र दे दिया।

    यही प्रावधान नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक और मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर लागू होते हैं।

    आंतरिक प्रक्रिया

    इसे 1997 में Restatement of Values of Judicial Life के साथ अपनाया गया।

    अपर जिला न्यायाधीश बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, 2015 ने इस प्रक्रिया को मान्यता दी।

    मुख्य न्यायाधीश न्यायिक कार्य वापस ले सकते हैं। यही एकमात्र अंतरिम दंड है।

    समिति की रिपोर्ट का प्रकाशन आवश्यक नहीं है, जो आलोचना को आमंत्रित करता है।

    सेवानिवृत्त हो चुके न्यायाधीश तक यह प्रक्रिया पहुँच ही नहीं सकती।

    सुधार और व्यापक बहस

    Judicial Standards and Accountability Bill, 2010 ने शिकायत संवीक्षा पैनल का प्रस्ताव रखा। यह व्यपगत हो गया।

    इसमें परामर्शी चेतावनी और परिनिंदा जैसे लघु उपायों की अनुमति होती।

    CPIO बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल, 2019: मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय एक लोक प्राधिकारी है।

    न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति की घोषणा 1997 के एक संकल्प के आधार पर स्वैच्छिक बनी हुई है।

    सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्तियों से पहले कूलिंग ऑफ अवधि एक बार बार आने वाला प्रस्ताव है।

    NJAC निर्णय, 2015 ने नियुक्ति सुधार को निरस्त कर दिया। जवाबदेही सुधार अब भीतर से ही आना होगा।

    Polity

← पूरी समय सारणी

यह पृष्ठ अंग्रेज़ी पृष्ठ का मशीनी अनुवाद है। संदेह होने पर अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक है। अनुवाद की त्रुटि बताएँ