VidBodh AcademyThe art and science of civil services preparation

21 सितंबर 2026GS2पुनरावृत्ति

पुनरावृत्ति: पहले तीन सप्ताह के प्रश्न

यहाँ वे प्रश्न भी आएँगे जिनके उत्तर आप पहले लिख चुके हैं। ऐसा जानबूझकर किया गया है। मॉडल उत्तर पढ़ने के बाद किसी उत्तर को दूसरी बार लिखना ही इस दिन का उद्देश्य है।

पिछले वर्षों के प्रश्न

5, जैसे पूछे गए
  1. 1 · GS2 201710 अंक150 शब्द

    “भारत में स्थानीय स्वशासन प्रणाली शासन का प्रभावी साधन सिद्ध नहीं हुई है।” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और स्थिति में सुधार के लिए अपने विचार दीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक निकाय बनाया। तीन दशक बाद यह स्तर हर जगह मौजूद है, किंतु शासन बहुत कम करता है।

    क्या कारगर रहा है

    प्रतिनिधित्व: 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि, जिनमें लगभग आधी महिलाएँ हैं।

    जहाँ हस्तांतरण वास्तविक था, वहाँ परिणाम: केरल का People's Plan और Kudumbashree दिखाते हैं कि कोष और कार्य से संपन्न पंचायतें क्या दे सकती हैं।

    क्यों नहीं हुआ

    कार्य: अनुसूची के विषय उदाहरणात्मक हैं; विकास प्राधिकरण और जल बोर्ड जैसे अर्ध सरकारी निकाय (parastatals) वास्तविक कार्य करते हैं।

    कोष: नगरपालिकाओं का अपना राजस्व GDP के 1 प्रतिशत के आसपास है, और अधिकांश प्राप्तियाँ बद्ध अनुदान के रूप में आती हैं।

    कार्मिक: कर्मचारी राज्य संवर्गों के होते हैं, इसलिए सरपंच क्रियान्वयनकर्ता को निर्देश नहीं दे सकता।

    शहरों की स्थिति सबसे ख़राब है: बेंगलुरु के महापौर को एक वर्ष का कार्यकाल मिलता है, जबकि शक्ति राज्य द्वारा नियुक्त आयुक्त के पास रहती है।

    सुधार कैसे हो

    वैधानिक गतिविधि मानचित्रण: जैसा Second ARC ने आग्रह किया था, प्रत्येक विषय के साथ कर्मचारी और बजट जोड़कर।

    हस्तांतरणों से पहले अपना राजस्व: सोलहवें वित्त आयोग का ₹7.91 लाख करोड़ का अनुदान संपत्ति कर के आधार का स्थान नहीं ले सकता।

    तीसरा स्तर संविधान ने बनाया, किंतु उसका वित्तपोषण और कर्मचारी आज भी राज्यों की इच्छा पर निर्भर हैं।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    आलोचनात्मक परीक्षण और सुझाव। कथन को पूरी तरह स्वीकार मत कीजिए, क्योंकि आलोचनात्मक परीक्षण सुझाव देने से पहले दोनों पक्षों को तौलता है।

    निहित माँग

    विफलता हस्तांतरण की है, संस्था की नहीं। जो संविधान ने बनाया और जो राज्यों ने अनुमति दी, उन्हें अलग कीजिए।

    उत्तर की संरचना

    अधिदेश → क्या कारगर रहा → कम प्रदर्शन क्यों → समाधान → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: 73वाँ और 74वाँ संशोधन, ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूचियाँ, तीन F, राज्य वित्त आयोग, सोलहवें वित्त आयोग का ₹7.91 लाख करोड़ का अनुदान। सार वाक्य: तीसरा स्तर संविधान ने बनाया, किंतु उसका वित्तपोषण और कर्मचारी आज भी राज्यों की इच्छा पर निर्भर हैं।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    क्या कारगर रहा है

    केरल के People's Plan Campaign, 1996 ने योजना कोष का बड़ा हिस्सा स्थानीय निकायों को सौंपा; Kudumbashree के अब चालीस लाख से अधिक सदस्य हैं और इसने महामारी के दौरान राहत कार्य सँभाला।

    PESA, 1996 पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को लघु वन उपज पर नियंत्रण और भूमि अधिग्रहण में सहमति की भूमिका देता है; यह पूरी व्यवस्था में सबसे सशक्त वैधानिक हस्तांतरण है।

    महामारी के दौरान पंचायतों ने क्वारंटीन केंद्र, राशन वितरण और प्रवासी रजिस्टर चलाए, जब किसी अन्य स्तर की इतनी पहुँच नहीं थी।

    eGramSwaraj और Ministry of Panchayati Raj के Devolution Index ने हस्तांतरण को राज्यवार मापने योग्य बनाया, इसलिए विफलता अब केवल आरोप नहीं, दर्ज तथ्य है।

    क्यों नहीं हुआ

    RBI Report on Municipal Finances नगरपालिकाओं के अपने राजस्व को लगभग GDP का 1 प्रतिशत बताती है; संपत्ति कर की वसूली आकलित क्षमता का छोटा अंश है।

    अनुच्छेद 243ZD और 243ZE द्वारा अनिवार्य जिला योजना समितियाँ और महानगर योजना समितियाँ अधिकांश राज्यों में केवल कागज़ पर हैं और कोई योजना नहीं बनातीं।

    तीन लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में आवश्यक वार्ड समितियाँ और क्षेत्र सभाएँ अधिकांशतः अनुपस्थित हैं, इसलिए पार्षद के नीचे नागरिक के पास कोई मंच नहीं है।

    प्रत्येक कार्यकाल में आरक्षित सीटों का चक्रानुक्रम किसी भी पदधारी को आधार बनाने या अनुभव संचित करने से रोकता है।

    दिल्ली में DDA, राज्य जल बोर्ड और शहरी विकास प्राधिकरण जैसे समानांतर निकाय ठीक वही कार्य रखते हैं जो बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध हैं।

    Second ARC की स्थानीय शासन पर छठी रिपोर्ट, 2007 लगभग दो दशक बाद भी अधिकांशतः लागू नहीं हुई है।

    सुधार कैसे हो

    Second ARC के प्रस्ताव के अनुसार हस्तांतरण पर एक ढाँचागत कानून, ताकि गतिविधि मानचित्रण प्रशासनिक के बजाय वैधानिक हो।

    पाँच वर्ष के कार्यकाल वाले प्रत्यक्ष निर्वाचित महापौर, और उनके प्रति उत्तरदायी एक समर्पित नगरपालिका संवर्ग।

    अलग नगरपालिका लेखे, राष्ट्रीय नगरपालिका लेखा मानक, और ऑनलाइन प्रकाशित अनिवार्य वार्षिक लेखापरीक्षा।

    अपने राजस्व के ऐसे साधन जिनके लिए राज्य की अनुमति आवश्यक न हो: भूमि मूल्य अधिग्रहण (land value capture), सुधार शुल्क (betterment levy) और युक्तिसंगत उपयोगकर्ता शुल्क।

    हस्तांतरण से जुड़े अंतरण: पंद्रहवें वित्त आयोग ने बद्ध अनुदान को लेखों के प्रकाशन और सेवा स्तर मानदंड पूरे करने से जोड़ा, जिस उपाय का विस्तार करना उचित है।

    हर राज्य में स्थायी स्थानीय शासन प्रशिक्षण संस्थान के लिए केरल का KILA एक आदर्श है।

    Polity

  2. 2 · GS2 201910 अंक150 शब्द

    क्या आप सोचते हैं कि भारत का संविधान शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को कठोर रूप में स्वीकार नहीं करता, बल्कि यह 'नियंत्रण और संतुलन' के सिद्धांत पर आधारित है? व्याख्या कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    हाँ। संविधान कार्यों को पृथक करता है, व्यक्तियों को नहीं। अंगों को सोच समझकर परस्पर जोड़ा गया है।

    जहाँ कठोर पृथक्करण अनुपस्थित है

    मंत्री संसद में बैठते हैं: कार्यपालिका विधायिका से ही बनती है।

    राष्ट्रपति संसद का अंग है: अनुच्छेद 79 राष्ट्रपति को दोनों सदनों के साथ संसद के भीतर रखता है।

    कार्यपालिका विधि बनाती है: वह अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश जारी करती है और प्रत्यायोजित नियम बनाती है।

    विधायिका न्याय करती है: वह समावेदन द्वारा न्यायाधीशों को हटाती है, और विशेषाधिकार हनन पर दंड देती है।

    न्यायपालिका नियम बनाती है: अनुच्छेद 145 न्यायालय को अपनी प्रक्रिया स्वयं बनाने देता है।

    नियंत्रण कहाँ हैं

    विधियों पर न्यायालय: अनुच्छेद 13, 32 और 226 के अंतर्गत न्यायिक पुनर्विलोकन हर विधि को परखता है।

    कार्यपालिका पर संसद: प्रश्न, प्रस्ताव और धन पर नियंत्रण उसे उत्तरदायी बनाए रखते हैं।

    न्यायालय ने क्या माना है

    राम जवाया कपूर, 1955: कठोर पृथक्करण नहीं है, यद्यपि कार्य भिन्न बने रहते हैं।

    इंदिरा नेहरू गांधी, 1975: संसद चुनाव विवाद का निर्णय नहीं कर सकती, क्योंकि यह न्यायिक कार्य है।

    संविधान ने दीवारों के बजाय संतुलन को चुना। प्रत्येक अंग दूसरों पर नियंत्रण रखता है, और कोई उनका स्थान नहीं ले सकता।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    हाँ या ना वाला प्रश्न, जिसमें उत्तर का संकेत दिया गया है। सहमत होइए, फिर उसे सिद्ध कीजिए।

    निहित माँग

    दोनों पक्ष दिखाइए। जहाँ पृथक्करण विफल होता है, और जहाँ नियंत्रण कारगर हैं।

    उत्तर की संरचना

    स्थिति → कठोर पृथक्करण का अभाव → नियंत्रण → निर्णय विधि → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 79, 123, 145, 13, 50, और तीन वाद। सार वाक्य: संविधान ने दीवारों के बजाय संतुलन को चुना।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    जहाँ कठोर पृथक्करण अनुपस्थित है

    अमेरिका अधिक कठोर प्रतिमान अपनाता है। मंत्रिमंडल के सदस्य कांग्रेस में नहीं बैठ सकते।

    मॉन्टेस्क्यू ने पृथक्करण का शास्त्रीय सिद्धांत दिया।

    दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निरर्हता (disqualification) का निर्णय अध्यक्ष (Speaker) करता है। यह न्यायिक कार्य है।

    अधिकरण कार्यपालिका विभागों के अधीन न्यायिक शक्ति का प्रयोग करते हैं।

    अनुच्छेद 117 के अंतर्गत धन विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की सिफ़ारिश आवश्यक है।

    नियंत्रण कहाँ हैं

    नियुक्तियों और पदों के सृजन में कार्यपालिका की भूमिका है।

    अनुच्छेद 121 संसद में किसी न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा का निषेध करता है।

    अनुच्छेद 122 न्यायालयों को संसदीय प्रक्रिया पर प्रश्न उठाने से रोकता है।

    नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक सरकार को नहीं, संसद को प्रतिवेदन देता है।

    अनुच्छेद 74 मंत्रिपरिषद की सलाह को राष्ट्रपति पर बाध्यकारी बनाता है।

    याद रखने योग्य निर्णय विधि

    राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य, 1955 आरंभ बिंदु है।

    केशवानंद भारती, 1973 ने शक्तियों के पृथक्करण को मूल ढाँचे में रखा।

    इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण, 1975 ने चुनाव विवाद का निर्णय करने वाले एक खंड को निरस्त कर दिया।

    Delhi Laws Act वाद, 1951 ने प्रत्यायोजन की अनुमति दी, किंतु आवश्यक विधायी कार्य के प्रत्यायोजन की नहीं।

    Madras Bar Association, 2014 ने सीमित किया कि अधिकरण किस सीमा तक न्यायालयों का स्थान ले सकते हैं।

    Polity

  3. 3 · GS2 202110 अंक150 शब्द

    'संवैधानिक नैतिकता' की जड़ें स्वयं संविधान में निहित हैं और यह उसके आवश्यक पहलुओं पर आधारित है। 'संवैधानिक नैतिकता' के सिद्धांत की प्रासंगिक न्यायिक निर्णयों की सहायता से व्याख्या कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है संविधान के मूल्यों के प्रति निष्ठा। डॉ. आंबेडकर ने चेताया था कि इसे विकसित करना होगा।

    सिद्धांत क्या कहता है

    पाठ पर्याप्त नहीं है: संस्थाएँ तभी काम करती हैं जब उन्हें चलाने वाले उसकी भावना का सम्मान करें।

    यह लोकप्रिय भावना से ऊपर है: बहुमत का मत किसी अधिकार की विषयवस्तु तय नहीं कर सकता।

    न्यायालयों ने इसका उपयोग कैसे किया है

    Naz Foundation, 2009: लोकप्रिय नैतिकता किसी अधिकार को प्रतिबंधित करने का आधार नहीं हो सकती।

    मनोज नरूला, 2014: इसे संवैधानिक पद धारण करने वालों पर एक कर्तव्य के रूप में पढ़ा गया।

    नवतेज सिंह जौहर, 2018: सामाजिक नैतिकता पीछे हटी, और धारा 377 को सीमित रूप में पढ़ा गया।

    सबरीमला, 2018: एक दीर्घकालिक प्रथा को समानता की कसौटी पर परखा गया, और वह विफल रही।

    सावधानी

    असहमति में बल है: न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने चेताया कि यह न्यायाधीश का अपना मत बन सकता है।

    विषयवस्तु निश्चित नहीं है: कोई प्रावधान इसे परिभाषित नहीं करता, इसलिए अर्थ बदलता रहता है।

    संवैधानिक नैतिकता बहुमत को संविधान को अपनी पसंद के अनुसार संकुचित करके पढ़ने से रोकती है। इसकी शक्ति इस पर निर्भर है कि न्यायाधीश इसे पाठ से जोड़ें।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    निर्णयों सहित व्याख्या कीजिए। यहाँ वाद सजावट नहीं हैं, वे ही माँग हैं।

    निहित माँग

    लोकप्रिय या सामाजिक नैतिकता से इसका अंतर ही सिद्धांत का वास्तविक अर्थ है।

    उत्तर की संरचना

    अर्थ → यह क्या कहता है → वाद → सावधानी → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर, Naz Foundation, नवतेज जौहर और सबरीमला। सार वाक्य: यह बहुमत को संविधान को संकुचित करके पढ़ने से रोकती है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    इस पद का उद्गम

    डॉ. आंबेडकर ने यह अभिव्यक्ति एथेंस पर लिखने वाले इतिहासकार जॉर्ज ग्रोट से ली।

    ग्रोट ने इसे स्वतंत्र आलोचना करते हुए भी रूपों का पालन करने की स्थिर आदत बताया।

    डॉ. आंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में इसे उद्धृत किया।

    उन्होंने कहा कि संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है, इसे विकसित करना पड़ता है।

    उनकी आशंका यह थी कि रूप लोकतांत्रिक था जबकि ज़मीन अलोकतांत्रिक बनी रही।

    उन्होंने राजनीति में नायक पूजा के विरुद्ध भी चेताया, जो इसी तर्क का अंग है।

    सिद्धांत वास्तव में क्या माँगता है

    पाठ का पालन इसका सबसे छोटा भाग है। पाठ के पीछे की भावना अधिक महत्त्वपूर्ण है।

    यह अल्पसंख्यक व्यक्ति की रक्षा करती है, चाहे वह धर्म, लिंग या मत के आधार पर अल्पसंख्यक हो।

    पदधारी को किसी शक्ति के केवल शब्दों का नहीं, उसके उद्देश्य का भी पालन करना चाहिए।

    यह न्यायालय से कहती है कि प्रचलित सामाजिक मत के बजाय संवैधानिक मूल्य को प्राथमिकता दे।

    यह परिपाटियों का भी समर्थन करती है, जिन्हें कोई न्यायालय लागू नहीं कर सकता, किंतु जो व्यवस्था को जोड़े रखती हैं।

    लोकप्रिय नैतिकता वह है जो अधिकांश लोग अनुभव करते हैं। संवैधानिक नैतिकता वह है जो दस्तावेज़ अपेक्षित करता है।

    निर्णय

    Naz Foundation बनाम दिल्ली का NCT, 2009 किसी भारतीय न्यायालय द्वारा इसका पहला प्रमुख उपयोग है।

    मनोज नरूला बनाम भारत संघ, 2014 गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे मंत्रियों से संबंधित था।

    पुट्टास्वामी, 2017 ने निजता को गरिमा में स्थित किया, जो इसी प्रकार का तर्क है।

    जोसेफ़ शाइन, 2018 ने इसी प्रकार के आधारों पर व्यभिचार के अपराध को निरस्त किया।

    Indian Young Lawyers Association, 2018 सबरीमला वाद है, जिसका निर्णय चार बनाम एक से हुआ।

    दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार बनाम भारत संघ, 2018 ने इसका उपयोग संवैधानिक पद के आचरण के लिए किया।

    नवतेज सिंह जौहर, 2018 ने सामाजिक नैतिकता से इसके अंतर को सबसे स्पष्ट रूप से कहा।

    आलोचना

    न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने माना कि न्यायालयों को धार्मिक प्रथा को अपनी धारणाओं से नहीं परखना चाहिए।

    उन्होंने चेताया कि यह सिद्धांत न्यायाधीश के हाथ में एक हथियार बन सकता है।

    सिद्धांत की कोई निश्चित विषयवस्तु नहीं है, इसलिए इसका अर्थ एक पीठ से दूसरी पीठ में बदल सकता है।

    आलोचकों का कहना है कि यह न्यायालय को एक खुले अर्थ वाले पद में अपनी पसंद पढ़ने देता है।

    सुरक्षा उपाय यह है कि हर उपयोग को संविधान के किसी विशिष्ट प्रावधान से जोड़ा जाए।

    सबरीमला से उत्पन्न पुनर्विलोकन याचिकाएँ अब भी बड़ी पीठ के समक्ष लंबित हैं।

    Polity

  4. 4 · GS2 202115 अंक250 शब्द

    किसी विशेष राज्य में FIR दर्ज करने और जाँच करने के संबंध में Central Bureau of Investigation (CBI) के क्षेत्राधिकार पर विभिन्न राज्यों द्वारा प्रश्न उठाए जा रहे हैं। तथापि, CBI को सहमति न देने की राज्यों की शक्ति निरपेक्ष नहीं है। भारत के संघीय स्वरूप के विशेष संदर्भ में व्याख्या कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    CBI का अपना कोई क़ानून नहीं है। यह Delhi Special Police Establishment Act, 1946 के अंतर्गत कार्य करती है। पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं, इसलिए यह अधिनियम किसी राज्य में एजेंसी के कार्य करने के लिए राज्य की सहमति अपेक्षित करता है।

    विधिक आधार

    अधिनियम की योजना: धारा 5 संघ को एजेंसी की शक्तियों का किसी राज्य तक विस्तार करने देती है; धारा 6 राज्य की सहमति के बिना उस विस्तार को निष्प्रभावी बनाती है।

    सहमति के दो रूप: सामान्य, जो मामलों के एक वर्ग के लिए एक बार दी जाती है, या विशिष्ट, जो प्रत्येक मामले में अलग से दी जाती है।

    राज्य आपत्ति क्यों करते हैं

    संवैधानिक: पुलिस राज्य का विषय है, और अप्रतिबंधित केंद्रीय जाँच उस क्षेत्र का क्षरण करती है जो अनन्य रूप से राज्यों को सौंपा गया है।

    राजनीतिक: विपक्षी सरकारों के विरुद्ध चुनिंदा उपयोग का आरोप लगाते हुए दस से अधिक राज्यों ने, जिनमें पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, तेलंगाना और कर्नाटक शामिल हैं, सामान्य सहमति वापस ले ली है।

    संस्थागत: स्वयं उच्चतम न्यायालय ने एक बार एजेंसी को पिंजरे में बंद तोता कहा था, जिससे यह धारणा कमज़ोर होती है कि सहमति देना सुरक्षित है।

    शक्ति निरपेक्ष क्यों नहीं है

    संवैधानिक न्यायालय सहमति से परे हैं: अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय कहीं भी CBI जाँच का निर्देश दे सकते हैं, और यह न्यायिक पुनर्विलोकन से निकलता है, जो मूल ढाँचे का अंग है।

    सहमति वापसी भावी होती है: सहमति रहते हुए दर्ज मामले उसके बाद भी बने रहते हैं।

    संघ के कर्मचारियों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता: केवल इस कारण कि उनका कार्यालय सहमति वापस लेने वाले राज्य में स्थित है।

    संघ के सरोकार के विषय: केंद्र शासित प्रदेशों और रेलवे क्षेत्रों में अपराध, और अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय विस्तार वाले मामले, किसी एक राज्य के नियंत्रण से बाहर हैं।

    कार्योत्तर सहमति: को पहले से आरंभ हो चुकी जाँच को वैध बनाने के लिए पर्याप्त माना गया है।

    संघीय दृष्टि से पाठ

    सहमति एक वास्तविक सुरक्षा उपाय है: जिसे न्यायालय ने संविधान के संघीय स्वरूप के अनुरूप बताया है।

    किंतु निरपेक्ष सहमति एक ढाल बन जाएगी: कोई राज्य अपने ही अधिकारियों को उन्मुक्ति दे सकेगा, जिसकी कोई संघीय सिद्धांत अपेक्षा नहीं करता।

    सहमति राज्य की पुलिस शक्ति की रक्षा करती है। इसे जाँच से उन्मुक्ति बनने नहीं दिया जा सकता। उपाय सहमति को समाप्त करना नहीं, बल्कि एजेंसी को परिभाषित क्षेत्राधिकार और पारदर्शी चयन वाला एक समर्पित क़ानून देना है, ताकि सहमति वापस लेना राजनीतिक रूप से लाभकारी न रहे।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    प्रश्न में दो भाग दिए गए हैं। राज्यों की आपत्ति, और यह कि फिर भी उनकी शक्ति निरपेक्ष क्यों नहीं है। संघीय ढाँचा दोनों को जोड़ता है।

    निहित माँग

    उत्तर DSPE Act की संरचना और संवैधानिक न्यायालयों के रिट क्षेत्राधिकार पर टिका है, जो सहमति की अपेक्षा से पूरी तरह बाहर है।

    उत्तर की संरचना

    विधिक आधार → राज्य आपत्ति क्यों करते हैं → सहमति निरपेक्ष क्यों नहीं → संघीय दृष्टि → आगे की राह → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: DSPE Act की धारा 5 और 6, राज्य सूची की प्रविष्टि 2 के रूप में पुलिस, दस से अधिक राज्यों द्वारा सहमति वापसी, अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायिक निर्देश, कार्योत्तर सहमति। सार वाक्य: सहमति राज्य की पुलिस शक्ति की रक्षा करती है, किंतु इसे जाँच से उन्मुक्ति बनने नहीं दिया जा सकता।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    विधिक आधार

    राज्य सूची की प्रविष्टि 2 पुलिस को समेटती है; संघ सूची की प्रविष्टि 80 किसी राज्य पुलिस बल के क्षेत्राधिकार का दूसरे राज्य में विस्तार केवल उस राज्य की सहमति से अनुमत करती है। अतः सहमति की अपेक्षा संरचनात्मक है, कोई रियायत नहीं।

    विनीत नारायण, 1997 ने एजेंसी को उसका पर्यवेक्षी ढाँचा दिया: CVC की निगरानी और निदेशक के लिए दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल।

    अब Lokpal Act, 2013 के अंतर्गत निदेशक का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा होता है।

    गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने नवेंद्र कुमार, 2013 में स्वयं CBI के गठन को अवैध माना; उच्चतम न्यायालय ने आदेश पर रोक लगा दी और प्रश्न अब भी खुला है, यह एक उल्लेखनीय तथ्य है जिसे बहुत कम अभ्यर्थी जानते हैं।

    शक्ति निरपेक्ष क्यों नहीं है

    पश्चिम बंगाल राज्य बनाम Committee for Protection of Democratic Rights, 2010 निर्णायक प्राधिकार है: संवैधानिक न्यायालय राज्य की सहमति के बिना CBI जाँच का निर्देश दे सकता है, और न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचे का अंग है।

    Fertico Marketing, 2021 और कंवल तनुज, 2020 पुष्टि करते हैं कि कार्योत्तर सहमति पहले से चल रही जाँच को वैध बनाती है।

    PMLA के अंतर्गत Enforcement Directorate को राज्य की किसी सहमति की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए CBI की सहमति वापस लेना मामलों को रोकता नहीं, केवल स्थानांतरित करता है।

    सहमति वापसी के बाद CBI द्वारा मामले दर्ज करने को लेकर अनुच्छेद 131 के अंतर्गत संघ के विरुद्ध पश्चिम बंगाल के वाद को सुनवाई योग्य माना गया, इसलिए यह विवाद स्वयं एक संघीय प्रश्न बन गया है।

    संघीय दृष्टि और आगे की राह

    Sarkaria और Punchhi दोनों आयोगों ने राज्यों में केंद्रीय एजेंसियों की तैनाती का परीक्षण किया और संयम तथा परामर्श की सिफ़ारिश की।

    कार्मिक संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने 1946 के अधिनियम के स्थान पर CBI के लिए समर्पित क़ानून की बार बार सिफ़ारिश की है।

    CVC के क्रमिक वार्षिक प्रतिवेदन कार्मिकों के लिए राज्य पुलिस पर एजेंसी की निर्भरता दर्ज करते हैं, जो उसकी पहुँच की व्यावहारिक सीमा है।

    तुलनात्मक टिप्पणी: FBI को क्षेत्राधिकार किसी संघीय अपराध के अस्तित्व से मिलता है, राज्य की सहमति से नहीं; इससे संकेत मिलता है कि वास्तविक सुधार सहमति पर मोलभाव करना नहीं, बल्कि उन अपराधों को परिभाषित करना है जिनकी जाँच एजेंसी कर सकती है।

    Polity

  5. 5 · GS2 202115 अंक250 शब्द

    क्या विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समितियाँ प्रशासन को सतर्क रखती हैं और संसदीय नियंत्रण के प्रति सम्मान की भावना जगाती हैं? उपयुक्त उदाहरणों सहित ऐसी समितियों के कार्यकरण का मूल्यांकन कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    समिति प्रणाली का पुनर्गठन 1993 में हुआ। अब 24 विभाग संबंधित समितियाँ हैं। प्रत्येक में 31 सदस्य होते हैं।

    जहाँ वे अच्छा काम करती हैं

    बजट पढ़ा जाता है: संसद अधिकांश माँगें गिलोटिन से पारित करती है। 2023 में माँगें लगभग बिना बहस के पारित हो गईं।

    विधेयक बेहतर होते हैं: Insolvency and Bankruptcy Code पर संयुक्त समिति ने पारित होने से पहले प्रारूप पर पुनः काम किया।

    मौन भी उत्तर हो सकता है: डेटा संरक्षण विधेयक पर समिति ने अस्सी से अधिक परिवर्तन माँगे। विधेयक 2022 में वापस ले लिया गया।

    अधिकारियों को उत्तर देना होता है: वित्त संबंधी स्थायी समिति ने विमुद्रीकरण के बाद रिज़र्व बैंक के गवर्नर को बुलाया।

    दलीय शोर घटता है: बैठकें बंद कमरे में होती हैं, और अधिकांश प्रतिवेदनों में असहमति टिप्पणियों के साथ एक साझा सिफ़ारिश होती है।

    जहाँ वे कम पड़ती हैं

    उपस्थिति कम रहती है: एक तिहाई की गणपूर्ति न होने के कारण बैठकें प्रायः स्थगित हो जाती हैं।

    कार्यकाल एक वर्ष का है: सीखे हुए का उपयोग हो सके, उससे पहले ही सदस्य प्रायः समिति छोड़ देता है।

    प्रतिवेदन बाध्यकारी नहीं हैं: सरकार किसी सिफ़ारिश को स्वीकार कर सकती है, अनदेखा कर सकती है, या उत्तर ही न दे।

    संदर्भित करना घटा है: 2020 के कृषि क़ानून किसी भी समिति को नहीं भेजे गए।

    अनुसंधान सहायता नहीं: सदस्य अपने किसी अनुसंधान कर्मचारी के बिना तकनीकी विधेयकों की जाँच करते हैं।

    दोनों दावों की परख

    प्रशासन को सतर्क रखने पर: हाँ, क्योंकि सचिव को स्वयं उपस्थित होकर रिकॉर्ड का बचाव करना पड़ता है।

    संसदीय नियंत्रण के प्रति सम्मान पर: कम, क्योंकि संदर्भित करना तत्कालीन सरकार की मनोदशा पर निर्भर है।

    ये समितियाँ प्रशासन को उत्तरदायी बनाए रखती हैं। ये आज्ञापालन नहीं करवातीं। सम्मान केवल संरचना से नहीं, बल्कि संदर्भण, उपस्थिति और अनुवर्ती कार्रवाई से आएगा।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    उदाहरणों सहित मूल्यांकन कीजिए। दो दावे किए गए हैं। प्रत्येक को परखिए।

    निहित माँग

    प्रश्न के दो भाग हैं। प्रशासन को सतर्क रखना एक है। सम्मान जगाना दूसरा।

    उत्तर की संरचना

    संरचना → जहाँ वे कारगर हैं → जहाँ कम पड़ती हैं → उदाहरण → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: 1993 का पुनर्गठन, 24 समितियाँ, गिलोटिन, 2023 के आपराधिक क़ानून विधेयक, 2020 के कृषि क़ानून। सार वाक्य: वे प्रशासन को उत्तरदायी बनाए रखती हैं, किंतु आज्ञापालन नहीं करवातीं।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    संरचना

    24 समितियाँ। प्रत्येक में लोक सभा के 21 और राज्य सभा के 10 सदस्य होते हैं।

    मंत्री सदस्य नहीं हो सकता। यदि कोई सदस्य मंत्री बन जाए, तो स्थान रिक्त हो जाता है।

    ये संविधान पर नहीं, दोनों सदनों के प्रक्रिया नियमों पर आधारित हैं।

    वित्तीय समितियाँ अलग हैं। लोक लेखा, प्राक्कलन और सार्वजनिक उपक्रम।

    परिपाटी के अनुसार लोक लेखा समिति की अध्यक्षता विपक्ष का एक सदस्य करता है।

    इस प्रणाली की सिफ़ारिश नियम समिति ने की थी और यह 1993 में 17 समितियों के साथ आरंभ हुई।

    याद रखने योग्य उदाहरण

    Insolvency and Bankruptcy Code, 2016: संयुक्त समिति ने पारित होने से पहले प्रारूप पर पुनः काम किया।

    Motor Vehicles Amendment Bill: 2019 के क़ानून से पहले परिवहन समिति ने इसकी जाँच की।

    Personal Data Protection Bill, 2019: समिति ने व्यापक परिवर्तन माँगे। विधेयक वापस ले लिया गया।

    आपराधिक क़ानून विधेयक, 2023: गृह मामलों की समिति को भेजे गए, फिर परिवर्तनों के साथ पुनः प्रस्तुत किए गए।

    कृषि क़ानून, 2020: समिति चरण के बिना पारित हुए। यह स्वयं विरोध का अंग बन गया।

    विमुद्रीकरण: वित्त समिति ने रिज़र्व बैंक के गवर्नर और वरिष्ठ अधिकारियों को बुलाया।

    जहाँ वे कम पड़ती हैं

    हाल की लोक सभाओं में समितियों को भेजे गए विधेयकों का अनुपात तेज़ी से घटा है।

    धन विधेयक के रूप में वर्गीकरण राज्य सभा और समिति दोनों की संवीक्षा को सीमित करता है।

    अध्यादेशों पर प्रतिवेदन प्रायः तब आते हैं जब अध्यादेश अपना काम कर चुका होता है।

    कोई नियम सरकार से यह अपेक्षा नहीं करता कि वह हर सिफ़ारिश का निश्चित समय में उत्तर दे।

    कार्यवाही गोपनीय होती है, इसलिए प्रतिवेदन प्रस्तुत होने तक सार्वजनिक बहस को कुछ नहीं मिलता।

    याद रखने योग्य सुधार

    डिफ़ॉल्ट रूप से हर विधेयक को समिति को भेजा जाए। किसी भी अपवाद के कारण सदन दर्ज करे।

    दो या तीन वर्ष का कार्यकाल, ताकि हर वर्ष सीखा हुआ नष्ट न हो।

    Congressional Research Service के प्रतिमान पर प्रत्येक समिति के लिए एक अनुसंधान इकाई।

    सरकार द्वारा की गई कार्रवाई संबंधी उत्तर प्रस्तुत करने की समय सीमा।

    प्रमुख विधेयकों पर जन सुनवाई, जैसी यूनाइटेड किंगडम में प्रवर समितियाँ करती हैं।

    यह नियम कि विधेयक पारित करने से पहले सदन समिति के प्रतिवेदन पर चर्चा करे।

    Polity

मौलिक प्रश्न

आज के 5
  1. 1 · VidBodh original10 अंक150 शब्द

    डिजिटल लामबंदी के युग में भारत में दबाव समूहों के बदलते स्वरूप पर चर्चा कीजिए। क्या अनौपचारिक, नेतृत्वविहीन संरचनाओं ने नीति को प्रभावित करने में संगठित संघों का स्थान ले लिया है?

    मॉडल उत्तर देखें

    सितंबर 2025 में नेपाल की सरकार ऑनलाइन संगठित विरोध प्रदर्शनों से गिर गई, जिनके पीछे कोई दल नहीं था। भारत ने 2011 से ऐसी ऊर्जा देखी है, किंतु क्या इसने संगठित संघों का स्थान ले लिया है?

    डिजिटल लामबंदी ने क्या बदला

    संगठित करना सस्ता हो गया: अब एक हैशटैग कार्यालय और सदस्यता रजिस्टर का स्थान ले लेता है, और इसी प्रकार India Against Corruption ने 2011 में रामलीला मैदान भर दिया।

    यह सीमित लड़ाइयाँ जीत सकती है: Save the Internet अभियान ने भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण को दस लाख ईमेल से पाट दिया, और 2016 में जीत हासिल की।

    इसने क्या नहीं बदला

    वार्ता के लिए समकक्ष चाहिए: चालीस से अधिक संगठनों को एकजुट करने वाले Samyukta Kisan Morcha ने कृषि क़ानूनों का निरसन इसलिए कराया क्योंकि वह मोलभाव कर सकता था।

    तकनीकी नीति स्थायी पहचान को पुरस्कृत करती है: उद्योग निकायों से बजट और शुल्कों पर परामर्श इसलिए किया जाता है क्योंकि वे विस्तृत जानकारी देते हैं।

    नेतृत्वविहीन ऊर्जा क्षीण हो जाती है: India Against Corruption दो वर्षों के भीतर विभाजित हो गया, जबकि पंजीकृत निकाय समाचारों से अधिक समय तक टिके रहते हैं।

    अनौपचारिक संरचनाएँ अब एजेंडे का अधिक भाग तय करती हैं, फिर भी उन्होंने संगठित संघों का स्थान नहीं लिया है। डिजिटल ऊर्जा मुद्दा उठाती है, और संगठन उसे जीवित रखता है।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    बदलाव पर चर्चा कीजिए, फिर स्थान लेने के बारे में सीधे प्रश्न का उत्तर दीजिए।

    निहित माँग

    ईमानदार उत्तर नहीं है, किंतु सीधा नहीं कहने से वह छूट जाता है जो वास्तव में बदला है, इसलिए दोनों भागों के लिए साक्ष्य चाहिए।

    उत्तर की संरचना

    समसामयिक संदर्भ → डिजिटल लामबंदी ने क्या बदला → क्या नहीं बदला → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: 2025 के नेपाल विरोध प्रदर्शन, India Against Corruption, Save the Internet और TRAI का निर्णय, Samyukta Kisan Morcha। सार वाक्य: डिजिटल ऊर्जा मुद्दा उठाती है, और संगठन उसे जीवित रखता है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    पुराने, संगठित रूप

    Confederation of Indian Industry (CII), Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry (FICCI) और NASSCOM जैसे व्यावसायिक निकाय बजट, व्यापार और प्रौद्योगिकी पर औपचारिक परामर्शों में शामिल होते हैं।

    Indian National Trade Union Congress (INTUC), Bharatiya Mazdoor Sangh (BMS) और Centre of Indian Trade Unions (CITU) जैसे श्रमिक संघ राजनीतिक दलों से जुड़े हैं।

    Indian Medical Association जैसे पेशेवर निकाय अपने क्षेत्र के विनियमन को आकार देते हैं।

    Association for Democratic Reforms (ADR) और Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) जैसे लोकहित समूह न्यायालयों और सूचना का अधिकार के माध्यम से कार्य करते हैं।

    सूचना का अधिकार अभियान राजस्थान की ग्राम जन सुनवाइयों से उपजा और 2005 में राष्ट्रीय क़ानून बन गया।

    डिजिटल मोड़

    2011 में India Against Corruption टेलीविज़न और सोशल मीडिया को एक साथ जोड़कर खड़ा हुआ पहला बड़ा भारतीय अभियान था।

    इसके एक भाग ने 2012 में Aam Aadmi Party बनाई, जो दिखाता है कि एक आंदोलन दबाव समूह के बजाय दल में बदल गया।

    2015 के Save the Internet अभियान के परिणामस्वरूप 2016 में TRAI का विनियमन आया, जिसने डेटा के लिए भेदभावपूर्ण शुल्कों पर रोक लगाई।

    2020 और 2021 के कृषक आंदोलन ने एक संगठित गठबंधन को व्यापक डिजिटल प्रसार के साथ जोड़ा।

    नेपाल में सितंबर 2025 के विरोध प्रदर्शन ऑनलाइन समन्वित हुए और उन्होंने प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देने पर विवश किया।

    ऑनलाइन संरचनाओं की न सदस्यता होती है, न कोष, और ध्यान हटते ही उनकी निरंतरता समाप्त हो जाती है।

    प्रभाव वास्तव में कैसे काम करता है

    Pre Legislative Consultation Policy, 2014 मंत्रालयों से टिप्पणी के लिए विधेयकों के प्रारूप प्रकाशित करने की अपेक्षा करती है।

    संसदीय स्थायी समितियाँ अभियानों की तुलना में संघों से कहीं अधिक बार साक्ष्य लेती हैं।

    मुक़दमेबाज़ी प्रभाव का एक प्रमुख मार्ग है, और मामला दायर करने तथा आगे बढ़ाने के लिए पंजीकृत निकाय चाहिए।

    विनियामक लिखित परामर्श करते हैं, जो विस्तृत तकनीकी उत्तर को पुरस्कृत करते हैं।

    2016 में स्थापित Internet Freedom Foundation ने एक डिजिटल अभियान को ऐसे निकाय में बदला जो प्रस्तुतियाँ देता है और मुक़दमे लड़ता है।

    हाल के सबसे सशक्त अभियानों ने सार्वजनिक डिजिटल चेहरे को एक संगठित केंद्र के साथ जोड़ा है।

    Polity

  2. 2 · VidBodh original10 अंक150 शब्द

    अनुच्छेद 355 के अंतर्गत संघ के दायित्व के दायरे का परीक्षण कीजिए। क्या यह शक्ति का एक स्वतंत्र स्रोत है, या केवल अनुच्छेद 356 की भूमिका?

    मॉडल उत्तर देखें

    अनुच्छेद 355 संघ पर प्रत्येक राज्य की बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से रक्षा करने का कर्तव्य डालता है। यह यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाई जाए।

    संकीर्ण पाठ

    एक भूमिका: यह अनुच्छेद अनुच्छेद 356 से ठीक पहले रखा गया है, जो केंद्र सरकार को किसी राज्य पर प्रत्यक्ष शासन लागू करने देता है, और यह उसका औचित्य प्रदान करता प्रतीत होता है।

    Sarkaria Commission: उसने माना कि अनुच्छेद 355 कोई स्वतंत्र विधायी या कार्यकारी शक्ति नहीं देता, केवल एक कर्तव्य देता है।

    व्यापक पाठ क्यों प्रबल हुआ है

    कर्तव्य साधन का निहितार्थ रखता है: Naga People's Movement of Human Rights, 1998 में न्यायालय ने माना कि इस कर्तव्य के साथ राज्य सरकार को हटाए बिना सशस्त्र बल तैनात करने की शक्ति भी आती है।

    इसका उपयोग एक क़ानून को निरस्त करने में हुआ है: सर्बानंद सोनोवाल, 2005 में न्यायालय ने अवैध प्रवासन को रोकने में संघ की विफलता को अनुच्छेद 355 के कर्तव्य का उल्लंघन माना।

    यह क्रमिक प्रतिक्रिया का आधार देता है: बोम्मई, 1994 बर्ख़ास्तगी को अंतिम कदम मानता है, इसलिए बर्ख़ास्तगी से कम के उपायों का आधार कहीं होना चाहिए, और वह आधार यही है।

    सीमा

    खुली छूट नहीं: यह कर्तव्य किसी निर्वाचित सरकार को हटाने का औचित्य नहीं बन सकता, जिसके लिए अनुच्छेद 356 और न्यायिक पुनर्विलोकन का अलग अनुशासन आवश्यक है।

    अनुच्छेद 355 न तो मात्र भूमिका है और न ही एक स्वतंत्र शक्ति। यह एक ऐसा कर्तव्य है जो बर्ख़ास्तगी से कम हर कदम को अधिकृत करता है, और ऐसा करके अनुच्छेद 356 के प्रयोग को आसान नहीं, दुर्लभ बनाता है।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    परीक्षण, और साथ में एक स्पष्ट या तो या। ईमानदार उत्तर दोनों अतियों को अस्वीकार करता है और कारण बताता है।

    निहित माँग

    प्रश्न वास्तव में इस बारे में है कि क्या संघ के पास कुछ न करने और सरकार को बर्ख़ास्त करने के बीच विकल्प हैं। ये विकल्प अनुच्छेद 355 में ही निहित हैं।

    उत्तर की संरचना

    कर्तव्य का पाठ → संकीर्ण पाठ → व्यापक पाठ क्यों प्रबल हुआ → सीमा → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 355 का पाठ, Sarkaria का मत, Naga People's Movement of Human Rights, सर्बानंद सोनोवाल, बोम्मई। सार वाक्य: अनुच्छेद 355 बर्ख़ास्तगी से कम हर कदम को अधिकृत करता है, और ऐसा करके अनुच्छेद 356 के प्रयोग को आसान नहीं, दुर्लभ बनाता है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    संकीर्ण पाठ

    अनुच्छेद 355 संविधान के प्रारूप में एक स्वतंत्र कर्तव्य के रूप में नहीं था; आंबेडकर ने इसे संघ की हस्तक्षेप शक्ति के औचित्य के रूप में उचित ठहराया, जो भूमिका वाले तर्क का पाठ्य आधार है।

    Sarkaria Commission, 1988 और बाद में Punchhi Commission, 2010 दोनों ने सचेत किया कि अनुच्छेद 355 को विधायी सक्षमता के स्रोत के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

    Punchhi Commission ने स्थानीयकृत आपातकाल, अर्थात किसी ज़िले या राज्य के किसी भाग तक सीमित कार्रवाई, का प्रस्ताव ठीक इसलिए रखा क्योंकि केवल अनुच्छेद 355 पर निर्भर रहना बहुत अस्पष्ट माना गया।

    व्यापक पाठ क्यों प्रबल हुआ है

    Naga People's Movement of Human Rights बनाम भारत संघ, 1998 ने संघ सूची की प्रविष्टि 2A के साथ पढ़े गए संघ के अनुच्छेद 355 वाले कर्तव्य के आंशिक आधार पर Armed Forces Special Powers Act को वैध ठहराया।

    सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ, 2005 ने IMDT Act को निरस्त किया और माना कि बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासन अनुच्छेद 355 के प्रयोजनों के लिए बाहरी आक्रमण के समान है।

    एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत उद्घोषणाओं को वादयोग्य (justiciable) बनाया, जिससे उद्घोषणा से कम हर विकल्प का व्यावहारिक मूल्य बढ़ गया।

    किसी राज्य में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती, और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के दौरान केंद्रीय निर्देश, व्यवहार में इसी कर्तव्य से जोड़े जाते हैं।

    सीमा और आगे की राह

    अनुच्छेद 355 राज्य सूची के किसी विषय पर विधायी सक्षमता नहीं दे सकता; उसके लिए अब भी अनुच्छेद 249, 250, 252 या 253 आवश्यक हैं।

    राज्य के अनुरोध के बिना तैनाती विवादित बनी हुई है, और Punchhi Commission ने मानदंड के रूप में राज्य से परामर्श की सिफ़ारिश की।

    अनुच्छेद 355 के अंतर्गत संघ कौन से उपाय कर सकता है, इसे परिभाषित करने और कारण दर्ज करना अनिवार्य बनाने वाला एक वैधानिक ढाँचा उस टकराव को कम करेगा जो अभी मामला दर मामला निपटाया जाता है।

    Polity

  3. 3 · VidBodh original15 अंक250 शब्द

    अनुच्छेद 110 के अंतर्गत धन विधेयक क्या है? निर्णीत वादों के संदर्भ में अध्यक्ष द्वारा त्रुटिपूर्ण प्रमाणन के परिणामों और उपलब्ध न्यायिक पुनर्विलोकन की सीमा का परीक्षण कीजिए।

    मॉडल उत्तर देखें

    अनुच्छेद 110 धन विधेयक को परिभाषित करता है। सूची संपूर्ण है, और विधेयक को केवल इन्हीं विषयों से संबंधित होना चाहिए।

    अनुच्छेद किन विषयों को समेटता है

    कराधान: किसी कर को अधिरोपित करना, उत्सादित करना, उसमें छूट देना या परिवर्तन करना।

    उधार: सरकार द्वारा धन उधार लेने का विनियमन।

    निधियाँ: संचित निधि और आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा।

    विनियोग: धन की निकासी, और किसी व्यय को निधि पर भारित घोषित करना।

    आनुषंगिक विषय: उपर्युक्त शीर्षों से आनुषंगिक कोई भी विषय, और उससे आगे कुछ नहीं।

    निर्णय कौन करता है: अनुच्छेद 110(3) के अंतर्गत अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है।

    ग़लत प्रमाणन क्यों महत्त्वपूर्ण है

    राज्य सभा की आवाज़ छिन जाती है: वह केवल चौदह दिनों के भीतर परिवर्तनों की सिफ़ारिश कर सकती है।

    संयुक्त बैठक नहीं: धन विधेयक कभी भी अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक में नहीं जा सकता।

    राष्ट्रपति इसे लौटा नहीं सकता: अनुमति व्यवहार में एक औपचारिकता है।

    इस प्रकार एक पूरे सदन को दरकिनार कर दिया जाता है: ग़लत प्रमाणपत्र द्वितीय सदन को विधि निर्माण की प्रक्रिया से बाहर कर देता है।

    न्यायालय कहाँ तक पुनर्विलोकन कर सकते हैं

    प्रारंभिक मत: मो. सईद सिद्दीकी, 2014 ने अध्यक्ष के निर्णय को पुनर्विलोकन से परे माना।

    मोड़: पुट्टास्वामी, 2018 ने प्रश्न का पुनर्विलोकन किया, यद्यपि बहुमत ने Aadhaar Act को वैध ठहराया।

    असहमति: न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने उस प्रमाणन को संविधान के साथ कपट कहा।

    अब भी अनिर्णीत: रोजर मैथ्यू, 2019 ने बहुमत पर संदेह व्यक्त किया और मुद्दा बड़ी पीठ को भेज दिया।

    प्रवृत्ति: अधिकरणों और अन्य क़ानूनों में संशोधन वित्त विधेयकों के माध्यम से किए गए हैं।

    अंतिमता उन्मुक्ति के समान नहीं है। निर्णय अध्यक्ष करता है, किंतु राज्य सभा को मौन करने वाला प्रमाणपत्र पुनर्विलोकन योग्य रहना चाहिए।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    तीन माँगें। परिभाषा, त्रुटि का परिणाम, और पुनर्विलोकन का दायरा।

    निहित माँग

    प्रश्न वास्तव में द्विसदनीयता के बारे में है। ग़लत प्रमाणपत्र एक सदन को मौन कर देता है।

    उत्तर की संरचना

    परिभाषा → ग़लत प्रमाणन क्यों महत्त्वपूर्ण है → पुनर्विलोकन कहाँ तक जाता है → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 110, अनुच्छेद 108, मो. सईद सिद्दीकी, पुट्टास्वामी, रोजर मैथ्यू, Finance Act का मार्ग। सार वाक्य: अंतिमता उन्मुक्ति के समान नहीं है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    अनुच्छेद किन विषयों को समेटता है

    अनुच्छेद 110(1) खंड (a) से खंड (g) तक सात शीर्ष सूचीबद्ध करता है।

    वित्तीय विधेयक व्यापक होता है। उसमें धन संबंधी विषयों के साथ अन्य प्रावधान भी होते हैं।

    अनुच्छेद 110(4) के अंतर्गत अध्यक्ष का प्रमाणपत्र केवल धन विधेयक पर होता है।

    धन विधेयक केवल लोक सभा में, राष्ट्रपति की सिफ़ारिश पर, पुरःस्थापित होता है।

    अनुच्छेद 199 राज्यों के लिए यही प्रावधान करता है। वहाँ विधानसभा का अध्यक्ष निर्णय करता है।

    वाद

    मो. सईद सिद्दीकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2014 ने अध्यक्ष के निर्णय को अंतिम और पुनर्विलोकन से परे माना।

    योगेंद्र कुमार जायसवाल, 2016 ने यही मत अपनाया।

    पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ, 2018 ने बहुमत से Aadhaar Act को धन विधेयक के रूप में वैध ठहराया।

    रोजर मैथ्यू बनाम South Indian Bank, 2019 ने उस तर्क पर संदेह व्यक्त किया और उसे सात न्यायाधीशों की पीठ को भेज दिया।

    किहोतो होलोहन, 1992 सिद्धांत देता है। अंतिमता खंड न्यायिक पुनर्विलोकन को अपवर्जित नहीं करता।

    उदाहरण और आगे की राह

    अधिकरण सुधार Finance Act, 2017 के माध्यम से किए गए।

    विदेशी अंशदान और धन शोधन क़ानून में संशोधनों के लिए भी वित्त विधेयकों का उपयोग हुआ है।

    वित्त विधेयक के माध्यम से पिछले कृत्यों के भूतलक्षी विधिमान्यकरण पर न्यायालय में प्रश्न उठाए गए हैं।

    खंड (g) का कठोर पाठ इसमें से अधिकांश को रोक देगा। आनुषंगिक का अर्थ आनुषंगिक ही है।

    बड़ी पीठ को भेजा गया संदर्भ अब भी निर्णय की प्रतीक्षा में है, इसलिए यह एक सक्रिय क्षेत्र बना हुआ है।

    Polity

  4. 4 · VidBodh original15 अंक250 शब्द

    अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग की शक्तियों के दायरे का परीक्षण कीजिए। क्या निर्वाचक नामावलियाँ तैयार करने की शक्ति विशेष गहन पुनरीक्षण का आदेश देने तक विस्तृत है, और उस शक्ति की सीमाएँ क्या हैं?

    मॉडल उत्तर देखें

    अनुच्छेद 324 निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है। ये शब्द व्यापक और अपरिभाषित हैं।

    शक्ति का दायरा

    जहाँ क़ानून मौन हो, वहाँ एक भंडार: मोहिंदर सिंह गिल, 1978 ने इसे अप्रावधानित परिस्थितियों के लिए शक्ति का भंडार कहा।

    किंतु क़ानून के विरुद्ध नहीं: ए. सी. जोस, 1984 ने माना कि आयोग किसी विद्यमान क़ानून के विपरीत कार्य नहीं कर सकता।

    यह मतदान के साथ नामावलियों को भी समेटता है: निर्वाचक नामावली तैयार करने का उल्लेख स्वयं अनुच्छेद में है।

    व्यवहार में व्यापक: चुनाव चिह्न और आदर्श आचार संहिता इसी शक्ति पर आधारित हैं।

    क्या यह गहन पुनरीक्षण को समेटता है

    क़ानून पहले से इसका प्रावधान करता है: 1950 के अधिनियम की धारा 21(3) किसी भी नामावली के विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है।

    न्यायालय ने अब इसे सुलझा दिया है: ADR बनाम निर्वाचन आयोग, 2026 ने विशेष गहन पुनरीक्षण को वैध ठहराया।

    तर्क: सटीक नामावली स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन का अंग है।

    लागू की गई कसौटी: आनुपातिकता। एक वैध उद्देश्य, ऐसे साधन जो अत्यधिक न हों, और उपलब्ध उपचार।

    सीमाएँ

    नागरिकता आयोग का विषय नहीं है: वह पात्रता की जाँच कर सकता है, किंतु यह तय नहीं कर सकता कि नागरिक कौन है।

    यह कहीं और का विषय है: उस प्रश्न का निर्णय Citizenship Act के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी करता है।

    प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए: किसी नाम को हटाने से पहले सूचना, सुनवाई और अपील की व्यवस्था होनी चाहिए।

    वर्ग के आधार पर बहिष्करण नहीं: अनुच्छेद 325 धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग पर आधारित किसी भी नामावली का निषेध करता है।

    न्यायिक पुनर्विलोकन बना रहता है: व्यापक शक्ति पुनर्विलोकन से परे शक्ति नहीं है, जैसा स्वयं मोहिंदर सिंह गिल ने कहा।

    अनुच्छेद 324 एक व्यापक शक्ति है, असीमित नहीं। यह आयोग को नामावली शुद्ध करने देता है। यह आयोग को यह तय करने नहीं देता कि राष्ट्र का अंग कौन है।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    तीन माँगें। दायरा, पुनरीक्षण पर विशिष्ट प्रश्न, फिर सीमाएँ।

    निहित माँग

    अंक सीमाओं वाले भाग में हैं। अनुच्छेद 324 की व्यापकता का वर्णन कोई भी कर सकता है।

    उत्तर की संरचना

    पाठ → वादों में दायरा → क्या यह पुनरीक्षण को समेटता है → सीमाएँ → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: अनुच्छेद 324, मोहिंदर सिंह गिल, ए. सी. जोस, धारा 21(3), 2026 का निर्णय, अनुच्छेद 325। सार वाक्य: यह आयोग को यह तय करने नहीं देता कि राष्ट्र का अंग कौन है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    शक्ति का दायरा

    मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त, 1978 अनुच्छेद 324 की व्यापकता पर प्रमुख वाद है।

    ए. सी. जोस बनाम शिवन पिल्लई, 1984 ने क़ानून द्वारा अनुमति मिलने से पहले वोटिंग मशीनों के उपयोग को निरस्त किया।

    कन्हैया लाल ओमर, 1985 ने चुनाव चिह्न आदेश को इस शक्ति के प्रयोग के रूप में वैध ठहराया।

    भारत संघ बनाम ADR, 2002 ने अभ्यर्थियों के लिए परिसंपत्तियों और आपराधिक मामलों का प्रकटीकरण अनिवार्य किया।

    टी. एन. शेषन, 1995 निकाय के भीतर आयुक्तों की समान स्थिति से संबंधित था।

    निर्वाचक नामावलियों से संबंधित क़ानून

    1950 के अधिनियम की धाराएँ 21 से 25 नामावलियों की तैयारी और पुनरीक्षण को शासित करती हैं।

    धारा 21(3) कारण दर्ज करके किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है।

    धारा 16 ऐसे व्यक्ति को, जो नागरिक नहीं है, नामांकन के लिए अयोग्य बनाती है।

    Registration of Electors Rules, 1960 प्रपत्र और प्रक्रिया निर्धारित करते हैं।

    संक्षिप्त पुनरीक्षण नियमित होता है। गहन पुनरीक्षण नई गणना से नामावली का पुनर्निर्माण करता है।

    अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है, और इसी कारण समावेशन त्रुटियाँ सबसे अधिक महत्त्व रखती हैं।

    2026 का निर्णय और बहस

    न्यायालय ने इस प्रक्रिया को विधिक रूप से टिकाऊ और आयोग की शक्तियों के भीतर माना।

    उसने ज़ोर दिया कि सुरक्षा उपाय और अपीलीय उपचार वास्तविक होने चाहिए, औपचारिक नहीं।

    उसने नामावली के लिए पात्रता को नागरिकता के किसी भी निर्धारण से अलग रखा।

    आलोचकों का तर्क है कि सबूत का भार सबसे निर्धन मतदाताओं पर आ जाता है।

    प्रतितर्क यह है कि फूली हुई नामावली परिणाम में विश्वास को क्षति पहुँचाती है।

    व्यापक प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रव्यापी पुनरीक्षण उसी संरचना का अनुसरण कर सकता है।

    Polity

  5. 5 · VidBodh original15 अंक250 शब्द

    भारत, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में द्वितीय सदन की स्थिति की तुलना कीजिए। संघीय प्रतिनिधित्व के उद्देश्य को कौन सा प्रतिमान सबसे अच्छी तरह पूरा करता है?

    मॉडल उत्तर देखें

    द्वितीय सदन तीन अलग कार्य कर सकता है: विधान का पुनरीक्षण, क्षेत्रीय इकाइयों का प्रतिनिधित्व, और बहुमत को धीमा करना। नीचे के तीनों सदन अलग अलग कार्यों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, इसलिए उन्हें एक ही पैमाने पर क्रमबद्ध नहीं किया जा सकता।

    भारत: राज्य सभा

    संरचना: राज्य विधायकों द्वारा निर्वाचित, चौथी अनुसूची के अंतर्गत जनसंख्या के अनुसार सीटों का आवंटन, और साथ में बारह मनोनीत सदस्य।

    शक्तियाँ: साधारण विधान पर समान, धन विधेयकों पर कमज़ोर, और अनुच्छेद 249 और 312 के अंतर्गत अनन्य।

    स्वरूप: रूप में संघीय, किंतु सीटें जनसंख्या के अनुसार होने के कारण यह निम्न सदन को संतुलित करने के बजाय उसी के तर्क को दोहराती है।

    यूनाइटेड किंगडम: House of Lords

    संरचना: नियुक्त पीयर, बिशप और वंशानुगत सदस्यों का एक शेष भाग। कोई भी निर्वाचित नहीं है।

    शक्तियाँ: Parliament Acts, 1911 और 1949 द्वारा रोकने के बजाय केवल विलंब करने तक सीमित, और सैलिसबरी परिपाटी द्वारा और अधिक नियंत्रित।

    स्वरूप: एकात्मक राज्य में एक पुनरीक्षण सदन। इसका उद्देश्य कभी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना नहीं था, और यह ऐसा करता भी नहीं।

    अमेरिका: सीनेट

    संरचना: आकार की परवाह किए बिना प्रत्येक राज्य के दो सीनेटर, जो सत्रहवें संशोधन, 1913 के बाद से प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते हैं।

    शक्तियाँ: विधान में समान, और संधियों के अनुसमर्थन, नियुक्तियों की पुष्टि तथा महाभियोग की सुनवाई में अनन्य भूमिकाएँ।

    स्वरूप: कहीं भी सबसे सशक्त संघीय सदन, क्योंकि राज्यों की समानता की गारंटी है और किसी राज्य की सहमति के बिना इसे संशोधन द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता।

    संघीय प्रतिनिधित्व को कौन सबसे अच्छी तरह पूरा करता है

    संघीय कसौटी पर: सीनेट, क्योंकि यह हर इकाई को एक न्यूनतम आधार देती है जिसे जनसंख्या नष्ट नहीं कर सकती।

    इसकी कीमत: राज्यों की समानता का अर्थ मतदाताओं की असमानता है, और छोटे राज्य के नागरिक का भार कहीं अधिक होता है।

    पुनरीक्षण पर: Lords सबसे अच्छा प्रदर्शन करता है, क्योंकि निर्वाचन के बिना विशेषज्ञता संवीक्षा के लिए उपयुक्त है।

    संघीय प्रतिनिधित्व के लिए अमेरिकी प्रतिमान सबसे सशक्त है, क्योंकि यह जनसंख्या की दोबारा नहीं, इकाई की रक्षा करता है। भारत की राज्य सभा नाम में राज्यों का और वास्तव में जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है, और इसीलिए परिसीमन का प्रश्न केवल निम्न सदन में नहीं सुलझाया जा सकता।

    देखें कि उत्तर कैसे बना

    प्रश्न को समझना

    तीन की तुलना कीजिए, फिर एक दी गई कसौटी पर एक को चुनिए। कसौटी दी गई है: संघीय प्रतिनिधित्व, पुनरीक्षण या दक्षता नहीं।

    निहित माँग

    यूनाइटेड किंगडम संघ नहीं है, इसलिए ईमानदार तुलना यह बताती है कि उसका द्वितीय सदन यही कार्य ख़राब ढंग से नहीं कर रहा, बल्कि कोई दूसरा कार्य कर रहा है।

    उत्तर की संरचना

    द्वितीय सदन किसलिए है → भारत → यूनाइटेड किंगडम → अमेरिका → दी गई कसौटी पर निर्णय → निष्कर्ष।

    अभिव्यक्ति

    आधार: चौथी अनुसूची, अनुच्छेद 249 और 312, Parliament Acts और सैलिसबरी परिपाटी, सत्रहवाँ संशोधन, सीनेट में राज्यों की समानता। सार वाक्य: भारत की राज्य सभा नाम में राज्यों का और वास्तव में जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है।

    अतिरिक्त सामग्री देखें

    भारत: राज्य सभा

    अधिकतम सदस्य संख्या 250 है, जिनमें 238 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से निर्वाचित होते हैं और 12 साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के लिए मनोनीत।

    इसका विघटन नहीं हो सकता, और हर दो वर्ष में एक तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं, जो अमेरिकी संरचना से लिया गया था।

    सरकार के बने रहने में इसकी कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में लाया जा सकता है।

    अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक में बड़ा सदन प्रबल रहता है, और ऐसा तीन बार हुआ है।

    यूनाइटेड किंगडम: House of Lords

    House of Lords Act, 1999 ने अधिकांश वंशानुगत पीयर हटा दिए, केवल 92 रहे, और उसके बाद से सुधार रुका हुआ है।

    Parliament Act, 1911 ने धन विधेयकों पर वीटो समाप्त किया और 1949 के अधिनियम ने विलंब की शक्ति घटाकर एक सत्र कर दी।

    सैलिसबरी परिपाटी Lords को सत्तारूढ़ दल के घोषणापत्र में वादा किए गए किसी उपाय को रोकने से नियंत्रित करती है।

    स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड को हस्तांतरण ने क्षेत्रीय राजनीति तो बनाई, किंतु कोई क्षेत्रीय सदन नहीं बनाया, और यही स्थायी आलोचना है।

    अमेरिका: सीनेट

    राज्यों का समान प्रतिनिधित्व संविधान के अनुच्छेद V द्वारा सुदृढ़ है, जो प्रभावित राज्य की सहमति के बिना इसमें संशोधन का निषेध करता है; यह ऐसा एकमात्र संरक्षित खंड है।

    सत्रहवें संशोधन, 1913 ने राज्य विधायिकाओं द्वारा निर्वाचन के स्थान पर प्रत्यक्ष निर्वाचन लागू किया, जिससे सदन का लोकतंत्रीकरण तो हुआ, किंतु संस्थाओं के रूप में राज्य कमज़ोर हुए।

    राजस्व विधेयक House of Representatives में ही आरंभ होने चाहिए, इसलिए धन के विषय में सीनेट भी समान नहीं है।

    फिलिबस्टर और साठ मतों की क्लोचर सीमा सदन को रोकने की एक और क्षमता देती है, जिसकी कोई संविधान अपेक्षा नहीं करता।

    उल्लेख योग्य अन्य प्रतिमान

    जर्मनी: बुंडेसराट राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों से बनता है जो एक गुट के रूप में मतदान करते हैं, और लैंडर को प्रभावित करने वाले क़ानूनों पर इसे पूर्ण वीटो प्राप्त है।

    कनाडा: सीनेटर क्षेत्रीय कोटे के अनुसार नियुक्त होते हैं, जिससे लोकतांत्रिक वैधता के बिना एक संघीय रूप बनता है।

    ऑस्ट्रेलिया: प्रत्यक्ष निर्वाचन के साथ राज्यों का समान प्रतिनिधित्व, अमेरिकी और भारतीय संरचनाओं का एक संकर रूप।

    सामान्य सीख: द्वितीय सदन इकाइयों की रक्षा तभी करता है जब प्रतिनिधित्व को जनसंख्या से अलग किया जाए।

    Polity

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